Tuesday, April 7, 2015

"दूसरी कहानी"

"दूसरी कहानी"


ये कैसी कहानी है-
ख़त्म ही नहीं होती,
जैसे ही लगता है
की अब अन्त होगा कहानी का
इस पात्र के बीत जाने के बाद,
वेताल की तरह फ़्लैशबैक
वापस कहानी के कन्धे पर सवार हो जाता है।

नफ़रत कर लेने से प्यार
ख़त्म नहीं हो जाता,
हाँ, दूसरे पात्र के आ जाने से
पहला पात्र
गुमशुदा सा लगने लगता है,
फिर भी यदा-कदा
वह ऐसे टपक जाता है
जैसे फ्रेम के अन्दर से
तस्वीर क्षण भर को मुस्कुरा दे
और पता भी न चले।

कहानी तो बढ़ रही है
और खिंच भी रही है,
साथ ही खींच रही है
कहानीकार को भी,
जो इस खिंचती कहानी के कारण
शायद ही अब,
प्रेमकहानी का
दूसरा अध्याय लिख पाये
और निरन्तर उलझा रहे,
पहले प्रेमकहानी में से
सहसा जीवित हो उठते
पात्रों के कारण

निर्मल अगस्त्य