Saturday, April 16, 2016

ग़ज़ल_ख़्वाहिशों के चराग़ों ने

ख़्वाहिशों  के  चराग़ों   ने, मोहब्बत ही जला डाला 
बेआरज़ू  ही   अच्छे   थे,   मतलब   ने  रुला डाला

नामाबर ही  सच्चा था,    ,हर रोज़   मिला तुझको 
उसके    पढ़ने     ने,     ,हर्फ़ों    को    हँसा    डाला 

इमाक़त नहीं मुमकिन, है अक़ीदत की ये फ़ितरत  
इबादत  का भ्रम रख,  ख़ुदा   को  ही   भुला  डाला

इतनी  कुर्बत  थी   कि  बसारत   से इत्मीनान रहे 
ख़ामख़ा  के   इल्लाह    ने   सरासर   ज़हर   डाला

इस्तिजारत    की   ज़रुरत   कभी   थी   ही   नहीं 
अब   चलते   हैं,  कह   के     बेगाना  बना   डाला 

12:39 AM, 17-04-2016
पटना