हर दिन सुबह-सुबह
मुट्ठी में धूप पकड़ कर
हम निकलते हैं
ठीक कल बीती ज़िन्दगी का
फ़ोटो-स्टेट कराने।
कहीं क़तार लम्बी होती है
कहीं बिजली नहीं होती,
कहीं मशीन ख़राब होती है
तो कहीं ऑपरेटर
खाना खाने गया होता है।
बाज़ार की गन्दगी से कभी-कभी
हम किसी गली में जा ही नहीं पाते हैं
जहाँ सम्भव था
ये समस्यायें नहीं होतीं।
हम ढ़ूँढ़ते हैं
साफ़ सुथरी सड़क के किनारे
कोई साफ़ सुथरी दुकान,
आख़िर सवाल है
ज़िन्दगी के फ़ोटो-स्टेट का
जो ठीक कल के कल बीती है।
लिट्टटी खाते... चाय पीते....
बच्चों की किताबें ख़रीदते.....
साग-भाजी का भाव पूछते...
फिसलती धूप को
मुट्ठी में पकड़े-पकडे़
घर वापस आने लगते हैं
और जब धूप
पूरी तरह मुट्ठठी से फिसल जाती है,
कल की ज़िन्दगी के
फ़ोटो-स्टेट की ज़रूरत ही नहीं रहती
जब आज के दिन की ज़िन्दगी की रचना
देहरी तक पहुँचते-पहुँचते
मूल पाण्डुलिपि में प्रस्तुत हो जाती है।
निर्मल अगस्त्य।
कविता संग्रह "इसी कुछ में" से
मुट्ठी में धूप पकड़ कर
हम निकलते हैं
ठीक कल बीती ज़िन्दगी का
फ़ोटो-स्टेट कराने।
कहीं क़तार लम्बी होती है
कहीं बिजली नहीं होती,
कहीं मशीन ख़राब होती है
तो कहीं ऑपरेटर
खाना खाने गया होता है।
बाज़ार की गन्दगी से कभी-कभी
हम किसी गली में जा ही नहीं पाते हैं
जहाँ सम्भव था
ये समस्यायें नहीं होतीं।
हम ढ़ूँढ़ते हैं
साफ़ सुथरी सड़क के किनारे
कोई साफ़ सुथरी दुकान,
आख़िर सवाल है
ज़िन्दगी के फ़ोटो-स्टेट का
जो ठीक कल के कल बीती है।
लिट्टटी खाते... चाय पीते....
बच्चों की किताबें ख़रीदते.....
साग-भाजी का भाव पूछते...
फिसलती धूप को
मुट्ठी में पकड़े-पकडे़
घर वापस आने लगते हैं
और जब धूप
पूरी तरह मुट्ठठी से फिसल जाती है,
कल की ज़िन्दगी के
फ़ोटो-स्टेट की ज़रूरत ही नहीं रहती
जब आज के दिन की ज़िन्दगी की रचना
देहरी तक पहुँचते-पहुँचते
मूल पाण्डुलिपि में प्रस्तुत हो जाती है।
निर्मल अगस्त्य।
कविता संग्रह "इसी कुछ में" से