Sunday, November 4, 2018

"वो कह रहा था"


"वो कह रहा था"

                                                         "निर्मल अगस्त्य" 


वो वहाँ...
दूर वहाँ...
मिट्टी के टीले पर खड़ा
नीम से कह रहा था कि
देवताओं कि भव्यता
अब उसे उबाऊ लगने लगी है
और कहते-कहते
हवा में अंगुलियाँ घुमा कर 
वह लिख भी रहा था।


आसमान - सिटकिनी !
बादल - यवनिका !
सन्दूक - देवता !
उसकी उँगलियाँ यह सब
हवा में उकेर रही थीं


गहरी सांसें ले रहा था वह
और वहीं था,
और कह रहा था कि
बिना आवेदन दिए
हवा को जी भर महसूस करने में
बड़ा आनन्द है,
और कितना खुलापन है यहाँ
कुलदेवता की कोठरी से
भाग कर आने के बाद
और वह नीम के तने को
अभी-अभी स्कूल से
लौट कर आये बच्चे की तरह
बेहिचक आलिंगन कर सकता है।


उसका कोई फ़िक्रमन्द नहीं था 
और इसी वज़ह से ख़ुश था कि
वह हिसाब-क़िताब कि दुविधा से परे है,
वह दुःख में निश्चित ही था  
लेकिन निश्चिन्त था भीड़ से,
तालियों की गड़गड़ाहट से।
अकेला था तो भरा-भरा था !
ख़ुद को पढ़ पा रहा है


आदमी - देवता !
वैराग्य - तमाशा !
दुःख - स्वतन्त्रता !
उसकी उँगलियाँ यह सब
हवा में उकेर रही थीं


वह वहीं पर खड़ा
नीम से कह रहा था कि
उसके पास भी घर है
और उसके घर में भी
देवताओं की अच्छी ख़ासी मण्डली है
जिन्हें, धूप -दीप दिखने के क्रम में
एक बार उसका हाथ जल भी चुका है।  
पड़ोसियों के घरों में भी 
कमोबेश यही स्थिति है
और लगभग सबों के यहाँ 
कोई एक एक व्यक्ति 
अपना हाथ जल चुका है। 


वह अब तक वहीं...
उसी नीम के नीचे कह रहा था कि 
ये देवता भी कितने स्वार्थी हो गए हैं 
जो बस अपने अटारियों में बैठे 
इन्तज़ार करते रहते हैं 
कि कब हममें से  
किसी का हाथ जल जाए!
हालाँकि, उनके पास पूरा समय है कि 
वे अपने पड़ोसी देवों और 
रिश्तेदार देवों के घर 
भेंट-मुलाक़ात और 
दुआ सलाम के लिए जाएँ । 
लेकिन क्या करें,
उन्हें भी अपने पसन्द के भाटों को 
सुनने की आदत जो पड़ गयी है। 


प्रसाद - मतलब !
स्वार्थ - भय !
भक्ति - चौहद्दी !
उसकी उँगलियाँ यह सब
हवा में उकेर रही थीं


दसों दिशाओं में शब्द 
उभर कर पसर रहे थे 
और वह कह रहा था कि 
देवता भी जब आलसी 
और घरघुसना हो चुके हैं 
तो हाथ जलने कि बजाय,
खुले खेतों और वादियों कि तरफ़ आकर,
दिन में कम से कम एक बार
आसमान को धन्यवाद कहना,
हवा को पहली प्रेमिका के 
शरीर की ख़ुश्बू कि तरह 
सीने में भर लेना,
नीम से कुछ बोल बतिया लेना 
मिट्टी के टीले पर चढ़ कर 
हवा में लिख लेना 
कहीं ज़्यादा भव्य और सुन्दर है। 


महल - पालतू !
दीप - रज्जू !
आरती - नीम !
उसकी उँगलियाँ यह सब
हवा में उकेर रही थीं


वो अब भी वहीं था 
वहीं पर अड़ा,
उसी नीम के पेड़ के नीचे 
मिट्टी के टीले पर चढ़ा,
बस्स... अभ्भी... तो था 
और बस कह ही तो रहा था !

"निर्मल अगस्त्य" 
25-11-2015 
पटना