मैं लिख रहा हूँ !
शायद इसलिये कि
बोलते वक़्त मेरी आवारगी में
सुबह उतर आती है,
इसलिये कि
बोलते-बोलते मैं कभी-कभी
आसमान को पुकारने लगता हूँ।
आसमान जो मेरा भी है
तुम्हारा भी है
जिसके पास तुम्हारे लिये
चाँद है, सितारे हैं,
मौज है, उड़ान है!
और मेरे लिये
एकांत है, अकेलापन है,
तल्ख़ी है, ख़ामोशी है!
इसलिये मैं लिख रहा हूँ।
मैं लिख रहा हूँ!
शायद इसलिये कि
बोलते वक़्त मेरी आखों में
लम्हें उभरने लगते है,
जहाँ से होकर
तुम भी गुज़रे थे
मैं भी गुज़रा था,
जिसमें तुम्हारे लिये उत्सव है,
मौसम है, चाँदनी है, बरसात है!
और मेरे लिये ख़्याल है,
कविता है, आलाप है, सुकून है!
इसलिये मैं लिख रहा हूँ।
मैं लिख रहा हूँ!
शायद इसलिये कि
बोलते वक़्त मेरे शब्दों में
अब शाम बहुत तेज़ी से ढ़लने लगती है
जिसके पास तुम्हारे लिये
क़ायदा है, चहारदीवारी है
दीया-बाती है, प्रार्थना है!
और मेरे लिये प्रवास है, यायावरी है,
जेठ है, मर्सिया है,
धूल है, चौखट है
इसलिये मैं लिख रहा हूँ!
निर्मल अगस्त्य
18-10-2015
पटना, बिहार।
शायद इसलिये कि
बोलते वक़्त मेरी आवारगी में
सुबह उतर आती है,
इसलिये कि
बोलते-बोलते मैं कभी-कभी
आसमान को पुकारने लगता हूँ।
आसमान जो मेरा भी है
तुम्हारा भी है
जिसके पास तुम्हारे लिये
चाँद है, सितारे हैं,
मौज है, उड़ान है!
और मेरे लिये
एकांत है, अकेलापन है,
तल्ख़ी है, ख़ामोशी है!
इसलिये मैं लिख रहा हूँ।
मैं लिख रहा हूँ!
शायद इसलिये कि
बोलते वक़्त मेरी आखों में
लम्हें उभरने लगते है,
जहाँ से होकर
तुम भी गुज़रे थे
मैं भी गुज़रा था,
जिसमें तुम्हारे लिये उत्सव है,
मौसम है, चाँदनी है, बरसात है!
और मेरे लिये ख़्याल है,
कविता है, आलाप है, सुकून है!
इसलिये मैं लिख रहा हूँ।
मैं लिख रहा हूँ!
शायद इसलिये कि
बोलते वक़्त मेरे शब्दों में
अब शाम बहुत तेज़ी से ढ़लने लगती है
जिसके पास तुम्हारे लिये
क़ायदा है, चहारदीवारी है
दीया-बाती है, प्रार्थना है!
और मेरे लिये प्रवास है, यायावरी है,
जेठ है, मर्सिया है,
धूल है, चौखट है
इसलिये मैं लिख रहा हूँ!
निर्मल अगस्त्य
18-10-2015
पटना, बिहार।
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