Sunday, November 22, 2015

गान्धारी_पट्टी वाली

गान्धारी_पट्टी वाली 


उस आशीर्वाद से सदैव दुःख उपजता है 
जो छलने के पहले या छल लेने के 
बाद दिया जाता है। 
उस छमायाचना से सदैव घृणा उपजती है 
जो अहंकार को कुछ पलों के लिए 
छुपाने के लिए की जाती है। 


लोग उनसे अविश्वास सीख जाते हैं 
जो स्वंय अविश्वास में जीता रहा हो 
खोखली विनम्रता ओढ़े हुए
किसी के विस्तार को काटने में मगन,
लेकिन उनसे कुछ नहीं ले पाते 
जो चिल्लाता रहा हो 
अपशब्द बोलता रहा हो 
किसी के विस्तार और प्रगल्भता के लिए। 


धरती पर कभी एक गान्धारी हुआ करती थी
अमृत पी के आई थी शायद,
अभी भी बहुतों में जीवित है। 
आँख वाले ये सोच रहे हैं 
कि सम्बन्धों में ये परेशानी क्यूँ है,
कुछ लोगों के अन्दर छिपी गान्धारी ये सोच रही है
कि बाक़ी करम के मारों की आँख क्यूँ  है।        
 

निर्मल अगस्त्य 
23-11-2015
पटना। 

Thursday, November 5, 2015

रुकूँ.......? या जाऊँ........?


कैसी कशिश है ये कैसी कहानी 
कि लब हैं लरजते, है आँखों में पानी.. 
कि कल जा का के मरहम ने 
फफोलों से पूछा है---


रुकूँ...?या जाऊँ...?


बेबस झरोखों में हवा डोलती है 
जुल्फें तुम्हारी कई रात घोलती हैं 
तुझे जी के मरने लगे हम हमेशा 
बाग़ी कलम मेरी ये राज़ खोलती है 


कि कल जा के साँसों ने 
सीने से पूछा है 
रुकूँ......?या जाऊँ........? 


कोई हक़ नहीं तुझपे मैं ये जानता हूँ 
फिर भी तुझे एक मेहर मानता हूँ 
मेरी ज़िंदगी है शोलों के काबिज़ 
तेरे ओठों पे चमकती अब्र मांगता हूँ 


कि  कल जा के धड़कन ने 
दिल से पूछा है 
रुकूँ.......? या जाऊँ........?


कैसी कशिश है ये कैसी कहानी 
कि लब हैं लरजते, है आँखों में पानी.. 
कि कल जा का के मरहम ने 
फफोलों से पूछा है ----


रुकूँ......?या जाऊँ........?