Wednesday, January 20, 2016

"शब्दों के होने से"


एक अकेला दिल 
कुछ पन्ने 
और शब्दों के साये! 

पिछले पन्ने का शेष 
पता नहीं कहाँ से 
आकस्मिक दुःख की तरह 
इस पन्ने में भी चला आता है? 

एक अकेला शरीर 
कुछ रिश्ते 
और शब्दों के साये! 
जबकि, 
मुझे अच्छी तरह याद है 
इस शेष को 
पिछले पन्ने में 
बक़ायदा निबटा दिया था मैंने। 

एक अकेली ज़िन्दगी 
कुछ सुख 
और शब्दों के साये! 

दुःख निबटता नहीं, 
आकस्मिक दुःख तो 
और भी नहीं निबटता। 
जैसे ख़त का 
लौटा दिया जाना, 
जूतों के फ़ीते 
ग़ुम हो जाना, 
कमीज़ के किसी बटन का 
ऊपर या नीचे वाले 
छेद में लग जाना, 
पक्की रात में 
ग्लास गिरने की आवाज़ से 
आती हुई नींद का सहम जाना। 


एक अकेली रात 
थोड़ी सी नींद, 
अस्वीकृत हस्तक्षेप 
और पिछले पन्ने का शेष! 
साथ-साथ आकस्मिक दुःख 
तो है ही है 
ज़िन्दगी के हिसाब-किताब में 
उलझने के लिये, 
और शब्दों के साये हैं! 
    
निर्मल अगस्त्य 
03:08 AM, 21-01-2016
पटना 


Sunday, January 3, 2016

"मेरी उम्र एक दीवार है"


आओ...
तुम भी लिखो,
मेरी उम्र की दीवार पर।


मेरी उम्र
जो गुज़रती गई दर-बदर,
कैसे बयां हो?
कि बस एक दीवार है
जिसपे पहली बार
कुछ बीस बरस पहले
लिखा था किसी ने-
‘‘मुझे तुमसे प्यार है!’’


वे तहरीर, वो लिखावट
और वही दीवार,
दर-बदर!
ये कैसे बयां हो।


यूँ ही साल दर साल
लिखते रहे लोग
मेरी उम्र की दीवार पर,
अपना नाम 
और मेरा नाम,
कुछ दिल सी आकृति के घेरों में,
जो टूटे 
तो टूटे बस उनके लिये। 


नाम मेरा रहा
उसी दिल सी आकृति के घेरों में
ख़ामोश!
जैसे मेरे उम्र की दीवार
रह गई ख़ामोश
दर-बदर गुज़रती हुई।


सब उसी यक़ीन से
निशानी छोड़ आये
कि जैसे लिखावट और वादे
एक ही चीज़ हो,
बस मेरी उम्र जानती है
और उम्र की दीवार
कि बस लिखावट 
रह गई है बाकी,
अब वादे कैसे बयां हो।


तुम ख़ुद को देखो
तो तुम
नई-नई आई हो,
मैं ख़ुद को देखूँ
तो तुम नई नहीं आई हो
जो इतनी संजीदा हो
और दूर-दूर, सहमी-सहमी सी
जैसे बारिश में भींगती।
एक बार तो लिख कर देखो-
अपना नाम, फिर मेरा नाम
दिल सी आकृति के घेरों में।


दीवारों से क्या रिश्ता
उम्र से क्या नाता,
और ऐसे भी बीतती है
तो बीतने दो,
ये मेरी उम्र है!
तुम बस लिखो
कि दो कदम पे तक़ल्लुफ़ है
और दो हाथ पे स्याही।
मेरी उम्र की दीवार पर
तुम भी...
तुम भी अपना नाम लिखो,
और वादे?
वादे तो भूल जाने के
मुकम्मल सामां हैं।


दिल सी आकृति के घेरों में
एक इबादत तुम भी लिखो
मेरी उम्र की दीवार पर,
तुम भी लिखो
बस उसी यक़ीन से,
तुम भी लिखो
बस उसी शिद्दत से,
तुम भी निशानी छोड़ दो 
कि तहरीर और अहद
एक ही तो चीज़ है।
घेरों की परवाह
तुम्हें क्यूँ कर हो,
वैसे भी अब तक उन घेरों में
उन दिल सी आकृति के घेरों में
बस मेरा नाम ही बाकी है,
मेरी उम्र की दीवार
गुज़रती आ रही है जो
दर-बदर!
ये कैसे बयां हो?

निर्मल अगस्त्य
07:05 PM, 03-01-2016
पटना