एक अकेला दिल
कुछ पन्ने
और शब्दों के साये!
पिछले पन्ने का शेष
पता नहीं कहाँ से
आकस्मिक दुःख की तरह
इस पन्ने में भी चला आता है?
एक अकेला शरीर
कुछ रिश्ते
और शब्दों के साये!
जबकि,
मुझे अच्छी तरह याद है
इस शेष को
पिछले पन्ने में
बक़ायदा निबटा दिया था मैंने।
एक अकेली ज़िन्दगी
कुछ सुख
और शब्दों के साये!
दुःख निबटता नहीं,
आकस्मिक दुःख तो
और भी नहीं निबटता।
जैसे ख़त का
लौटा दिया जाना,
जूतों के फ़ीते
ग़ुम हो जाना,
कमीज़ के किसी बटन का
ऊपर या नीचे वाले
छेद में लग जाना,
पक्की रात में
ग्लास गिरने की आवाज़ से
आती हुई नींद का सहम जाना।
एक अकेली रात
थोड़ी सी नींद,
अस्वीकृत हस्तक्षेप
और पिछले पन्ने का शेष!
साथ-साथ आकस्मिक दुःख
तो है ही है
ज़िन्दगी के हिसाब-किताब में
उलझने के लिये,
और शब्दों के साये हैं!
निर्मल अगस्त्य
03:08 AM, 21-01-2016
पटना
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