वो दुनियाँ...
विश्लेषन की कैंची से परे
तर्क के सैंड पेपर से
दूर हम खडे़
जो था बस कल्पना थी...
मन था... सपने थे...
जहाँ परियाँ थी झूलों पर
बोतल में बन्द जिन्न था
भूत, पिशाच, अमावस की रात में
रोटी-प्याज़ माँगने वाली बुढ़िया
और झाड़ू पर उड़ने वाली चुड़ैलैं थी,
बचपन की वो दुनियाँ
जो पीछे छूट गयी
कहानियों वाली दुनियाँ
कॉमिक्सों वाली दुनियाँ
रेडियो, अख़बारों वाली दुनियाँ।
वो गुड्डे-गुड़ियों की शादी की दुनियाँ
वो परियों की कहानियों की दुनियाँ,
वो शरबत की दुनियाँ
जिसके लिये नीम्बू
बड़ी बहादुरी से चुराये थे हमने,
वो पहली-पहली बार पिकनिक की दुनियाँ
जिसके लिये चूल्हे जलाये थे हमने।
वो पूड़ी जो कच्ची भी-पक्की भी प्यारी थी
वो सब्ज़ी जो हम मिनटों में चट कर जाते थे
फ़िर बर्तनों से टन-टन लड़ाई की दुनियाँ
वो मीठे मोहब्बत के झगड़ों की दुनियाँ
वो काग़ज़ी बन्दूकों से ढिचक्यों का खेला
वो दुर्गाबाड़ी में चैतीदुर्गा का मेला
उस मेले में संवरकी के बेर की चटनी
खिचड़ी के परसाद के लाईन का रेला।
वो पानी की कमसिन मूँछों की दुनियाँ
वो मूँछों में सनसनाती पानी की दुनियाँ
वो दुनियाँ तुम्हारी थी वो दुनियाँ थी मेरी
कहाँ छोड़ आये चकल्लस की दुनियाँ।
निर्मल अगस्त्य।
(कविता संग्रह "इसी कुछ में" से।)
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