Friday, January 16, 2015

"वो कह रहा था"



वो वहाँ...
दूर वहाँ,
मिट्टी के टीले पर खड़ा
नीम से कह रहा था कि
देवताओं कि भव्यता
अब उसे उबाऊ लगने लगी है
और कहते-कहते
हवा में अंगुलियाँ घुमा कर
वह लिख भी रहा था।


आसमान - सिटकिनी !
बादल - यवनिका !
सन्दूक - देवता !
उसकी उँगलियाँ यह सब
हवा में उकेर रही हैं।


गहरी सांसें ले रहा था वह
और वहीं था,
और कह रहा था कि
बिना आवेदन दिए
हवा को जी भर महसूस करने में
बड़ा आनन्द है।
कितना खुलापन है यहाँ,
कुलदेवता की कोठरी से
भाग कर आने के बाद
और वह नीम के तने को
अभी-अभी स्कूल से
लौट कर आये बच्चे की तरह
बेहिचक आलिंगन कर सकता है।


उसका कोई फ़िक्रमन्द नहीं है
और इसी वज़ह से ख़ुश है कि
वह हिसाब-क़िताब कि दुविधा से परे है,
वह दुःख में है तो निश्चिन्त है भीड़ से,
तालियों की गड़गड़ाहट से।
अकेला है तो भरा-भरा है !
ख़ुद को पढ़ पा रहा है !


आदमी - देवता !
वैराग्य - तमाशा !
दुःख - स्वतन्त्रता !
उसकी उँगलियाँ यह सब
हवा में उकेर रही हैं।


वह वहीं पर खड़ा
नीम से कह रहा था कि
उसके पास भी घर है
और उसके घर में भी
देवताओं की अच्छी ख़ासी मण्डली है
जिन्हें धूप -दीप दिखने के क्रम में
एक बार उसका हाथ जल भी चुका है।
पड़ोसियों के घरों में भी
कमोबेश यही स्थिति है
और लगभग सबों के यहाँ
कोई एक न एक व्यक्ति
अपना हाथ जला चुका है।


वह अब तक वहीं...
वहीं नीम के नीचे कह रहा था कि
ये देवता भी कितने स्वार्थी हो गए हैं
जो बस अपने अटारियों में बैठे
इन्तज़ार करते रहते हैं
कि कब हममें से कब
किसी का हाथ जल जाए!
हालाँकि, उनके पास पूरा समय है कि
वे अपने पड़ोसी देवों और
रिश्तेदार देवों के घर
भेंट-मुलाक़ात और दुआ सलाम के लिए
जा सकते हैं।
लेकिन क्या करें,
उन्हें भी अपने पसन्द के भाटों को
सुनने की आदत जो पड़ गयी है।


प्रसाद - मतलब !
स्वार्थ - भय !
भक्ति - चौहद्दी !
उसकी उँगलियाँ यह सब
हवा में उकेर रही हैं।


दसों दिशाओं में शब्द
उभर कर पसर रहे थे
और वह कह रहा था कि
देवता भी जब आलसी
और घरघुसना हो चुके हैं
तो हाथ जलने कि वजाय,
खुले खेतों और वादियों कि तरफ़ आकर,
दिन में कम से कम एक बार
आसमान को धन्यवाद कहना,
हवा को पहली प्रेमिका के
शरीर की ख़ुश्बू कि तरह
सीने में भर लेना,
नीम से कुछ बोल बतिया लेना
मिट्टी के टीले पर चढ़ कर
हवा में लिख लेना
कहीं ज़्यादा भव्य और सुन्दर है।


महल - पालतू !
दीप - रज्जू !
आरती - नीम !
उसकी उँगलियाँ यह सब
हवा में उकेर रही हैं।


वो अब भी वहीं था
वहीं पर अड़ा,
उसी नीम के पेड़ के नीचे
मिट्टी के टीले पर चढ़ा,
बस्स... अभ्भी... तो था
और बस कह ही तो रहा था !

(निर्मल अगस्त्य)

2012 की डायरी से .......
   

Wednesday, January 14, 2015

"कोई ख़्वाब जो तुझे"

कोई ख़्वाब जो तुझे 
टोकता ही रहे,
कोई अक्स जो तुझे 
ढूँढता ही रहे। 

आसमाँ को क्यूँ होगा, इंतज़ार बादलों का
बादलों को क्यूँ होगा, इंतज़ार ज़मीं का
बेरुख़ी को क्यूँ होगा, इंतज़ार इल्तिज़ा का 
इल्तिज़ा का क्यूँ होगा, इंतज़ार तड़प का।  


ज़िन्दगी के आधे सच, आधे-आधे झूठे थे
ज़िन्दगी के आधे झूठ, आधे-आधे सच्चे थे, 
ज़िन्दगी ने आधी क़समें आधे मन से खायीं थीं 
ज़िन्दगी ने आधे मन को आधे तन  में पायी थी,
इन आधों में, इन वादों में, ज़िन्दगी कहाँ !


ज़िन्दगी के आधे ख़त, लिफ़ाफे में ही छूट गए 
ज़िंदगी के आधे रिश्ते, आधे पल में टूट गए,
ज़िन्दगी के आधे इरादे हाशियों में जागे थे
ज़िन्दगी के तीनो अक्षर, ढ़ाई छोड़ के भागे थे,
इन वादों में, इन इरादों में, ज़िन्दगी कहाँ !

कोई ख़्वाब जो तुझे 
टोकता ही रहे,
कोई अक्स जो तुझे 
ढूँढता ही रहे। 

आसमाँ को क्यूँ होगा, इंतज़ार बादलों का
बादलों को क्यूँ होगा, इंतज़ार ज़मीं का
बेरुख़ी को क्यूँ होगा, इंतज़ार इल्तिज़ा का 
इल्तिज़ा का क्यूँ होगा, इंतज़ार तड़प का।  

(मैंने इस गीत को एक हिन्दी फ़िल्म के लिए 2011 में लिखा और संगीतबद्ध किया था जिसकी रिकॉर्डिंग भी हो चुकी है लेकिन कई कारणों से फ़िल्म बन नहीं पाई।)
"निर्मल अगस्तय। "


 

Monday, January 12, 2015

"मन मिट्टी, तन बूँद ज़रा सी"

मन मिट्टी, तन बूँद ज़रा सी



मन है मिट्टी,
इसी में सब मिल जाना है!


माँ का अविश्वास
पिता का सन्ताप 
कि आकाश झूठा
पैसा सच्चा,


यह अविश्वास
और  यह सन्ताप 
चूँकि मेरे मन में भी आ बसा है
तो ज़िंदा है,
तैरता रहता है
उड़ता रहता है,
कभी  सिल बन कर जम जाता है
कभी पिघल कर बहने लगता है।


ईमानदारी झूठी,
दुनियावी ज़रूरतें सच्चीं
सच्चाई ख़राब
सफलता अच्छी,
सब समेटता है मन
और सब कुछ टटोल जाता है,
जब कहने के लिए
कहीं से शब्द नहीं मिलते।


और जो मिलते हैं
वो किसी ग़ुम हो गयी  डायरी के
उन पन्नों से भागे हुए हुए होते हैं,
जिन पन्नों को मोड़ कर
निशान लगाया जाता है अक़्सर
कि कुछ लिखना बाक़ी हो शायद।


जो बाक़ी है
वो भी मन है
और जो निबट गया
वो भी मन है।


जी गया !
और जीना है!
या शायद जी लेना है!
ये भी मन ही है।
मन न रहे
तो न अविश्वास रहे न माँ
न सन्ताप रहे न पिता,
न शरीर रहे न कलेवर
न मृत हो पायें न अजर !
पता नहीं मेरे शब्द क्यूँ ज़िंदा हैं 
शायद ये भी मन ही है।

"निर्मल अगस्त्य"
12 जनवरी, 2015
पटना