कोई ख़्वाब जो तुझे
टोकता ही रहे,
कोई अक्स जो तुझे
ढूँढता ही रहे।
आसमाँ को क्यूँ होगा, इंतज़ार बादलों का
बादलों को क्यूँ होगा, इंतज़ार ज़मीं का
बेरुख़ी को क्यूँ होगा, इंतज़ार इल्तिज़ा का
इल्तिज़ा का क्यूँ होगा, इंतज़ार तड़प का।
ज़िन्दगी के आधे सच, आधे-आधे झूठे थे
ज़िन्दगी के आधे झूठ, आधे-आधे सच्चे थे,
ज़िन्दगी ने आधी क़समें आधे मन से खायीं थीं
ज़िन्दगी ने आधे मन को आधे तन में पायी थी,
इन आधों में, इन वादों में, ज़िन्दगी कहाँ !
ज़िन्दगी के आधे ख़त, लिफ़ाफे में ही छूट गए
ज़िंदगी के आधे रिश्ते, आधे पल में टूट गए,
ज़िन्दगी के आधे इरादे हाशियों में जागे थे
ज़िन्दगी के तीनो अक्षर, ढ़ाई छोड़ के भागे थे,
इन वादों में, इन इरादों में, ज़िन्दगी कहाँ !
कोई ख़्वाब जो तुझे
टोकता ही रहे,
कोई अक्स जो तुझे
ढूँढता ही रहे।
आसमाँ को क्यूँ होगा, इंतज़ार बादलों का
बादलों को क्यूँ होगा, इंतज़ार ज़मीं का
बेरुख़ी को क्यूँ होगा, इंतज़ार इल्तिज़ा का
इल्तिज़ा का क्यूँ होगा, इंतज़ार तड़प का।
(मैंने इस गीत को एक हिन्दी फ़िल्म के लिए 2011 में लिखा और संगीतबद्ध किया था जिसकी रिकॉर्डिंग भी हो चुकी है लेकिन कई कारणों से फ़िल्म बन नहीं पाई।)
"निर्मल अगस्तय। "
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