Monday, January 12, 2015

"मन मिट्टी, तन बूँद ज़रा सी"

मन मिट्टी, तन बूँद ज़रा सी



मन है मिट्टी,
इसी में सब मिल जाना है!


माँ का अविश्वास
पिता का सन्ताप 
कि आकाश झूठा
पैसा सच्चा,


यह अविश्वास
और  यह सन्ताप 
चूँकि मेरे मन में भी आ बसा है
तो ज़िंदा है,
तैरता रहता है
उड़ता रहता है,
कभी  सिल बन कर जम जाता है
कभी पिघल कर बहने लगता है।


ईमानदारी झूठी,
दुनियावी ज़रूरतें सच्चीं
सच्चाई ख़राब
सफलता अच्छी,
सब समेटता है मन
और सब कुछ टटोल जाता है,
जब कहने के लिए
कहीं से शब्द नहीं मिलते।


और जो मिलते हैं
वो किसी ग़ुम हो गयी  डायरी के
उन पन्नों से भागे हुए हुए होते हैं,
जिन पन्नों को मोड़ कर
निशान लगाया जाता है अक़्सर
कि कुछ लिखना बाक़ी हो शायद।


जो बाक़ी है
वो भी मन है
और जो निबट गया
वो भी मन है।


जी गया !
और जीना है!
या शायद जी लेना है!
ये भी मन ही है।
मन न रहे
तो न अविश्वास रहे न माँ
न सन्ताप रहे न पिता,
न शरीर रहे न कलेवर
न मृत हो पायें न अजर !
पता नहीं मेरे शब्द क्यूँ ज़िंदा हैं 
शायद ये भी मन ही है।

"निर्मल अगस्त्य"
12 जनवरी, 2015
पटना    

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