"शरत चटर्जी रोड के फ्लैट में लिखी एक कविता !"
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(1)
फूटपाथ पर दिखा एक सांवला सा युवक
दमदम मेट्रो स्टेशन से बाहर
जो घिरा हुआ था,
खुले, अधखुले
छोटे-छोटे कपड़ों की थैलियों से,
उनमें से झाँक रहे थे- "बीज" !
तरह-तरह के बीज !
कद्दू, करेला, सीम, कुम्हड़ा, खीरा
लाल साग, डांटा साग,
बीन्स और न जाने क्या-क्या।
काले बादल आकाश से
बरसने को व्याकुल
चौमासे के दूसरे महीने में
और व्याकुल लग रहे थे कि
कोई ले जाए हमें भी
इस श्रावण मास में,
और अपने बीज होने के
दायित्व के निर्वाह करने का मौका
मिले उन्हें भी।
(2)
मैं झुक कर उसके सामने बैठ गया,
मैं पूछता गया
वो युवक बताता गया:
दाम, रोपने का तरीका
मिटटी के प्रकार
और उर्वरकों का प्रयोग,
सारे बीज जैसे
जुगनुओं की तरह चमकने लगे,
पहले मैं....मैं...!
और सारे बीजों को
अंकुरित होने की
प्रत्याभूति दी उसने,
चमकते हुए बीजों को !
(3)
इस महानगर में
मेरे चारों और सीमेंट है,
यहाँ पौधा रोपना तो दूर
सूँघने तक को मिट्टी नहीं है,
मेरे इस कबाड़नुमा कमरे के
इर्द-गिर्द, किसी कोने में भी नहीं,
मेरी मिटटी तो वहां है
जहाँ जाना है मुझे कल
अपने माता-पिता के पास।
(4)
हालाँकि, यह भी एक शहर ही है
लेकिन, पिता जी के भीतर
कहीं एक किसान जीवित है अभी भी,
मकान के आगे
यूँ ही नहीं
लगभग सौ वर्गफूट की जगह
गंगा की मिट्टी से भरी है।
(5)
पिताजी की बहुत इच्छा होती है
ताज़े, बिना उर्वरक वाले
और कीटनाशक के ज़हर से मुक्त
हरी भरी सब्ज़ियाँ खाने की,
इसलिए मैंने ख़रीदे
तरह-तरह के बीज जो
फूटपाथ पर थैलियों में बन्द
लालायित थे--
अपने दायित्व के निर्वाह के लिए।
(6)
मैं सोचता हूँ अपने बारे में
कि मैं भी तो एक पौधा ही हूँ,
लेकिन क्या पता कब तक फलूँगा ?
फलूँगा भी तो क्या --
माँ-पिताजी चख पायेंगे
मेरी मिठास।
अगर कड़वा निकल गया
तो कड़वाहट में भी
नीम-करेले का गुण ढूँढ लेंगे।
(7)
क्यूँकि, वो दोनों मेरे रचियेता हैं !
अन्तर यह है कि
मैं पूर्ण बीज ले जा रहा हूँ
जबकि उन्होंने कोई
तीन दशक पहले
आधे-आधे बीजों को
प्रकृति के अद्भुत संयोग से
एक सुन्दर अति सुरक्षित
सृजन-स्थल में गर्भित किया था था,
और कितने झंझावातों से बचाते हुए
अब तक पनपाते रहे हैं।
अपने द्वारा रोपित
अब तक अफलित पौधे को,
और आशावान हैं कि
कभी न कभी तो
मैं भी फलूँगा
उनके समयातीत होने से पहले।
(निर्मल अगस्त्य)
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