"एक ठहरा हुआ ख़त जो भेज न सका"
जीने का हुनर तुम रख लो
चाहने की इजाज़त मुझे दे दो,
पाने की तमन्ना तेरा हक़ है
खोने का हक़ तो मुझे दे दो।
ऐसे भी हम बन्द गली के
अन्धे कोने में बसते हैं,
जी चाहे तेरे नूर से चमकें
लेकिन कहने से डरते हैं
कुछ भी आखिरी नहीं दुनिया में
आखिरी सदा का हक़ तो मुझे दे दो,
जीने का हुनर तुम रख लो
चाहने की इजाज़त मुझे दे दो।
छोड़ सकूँ ये कब होता है
मेरी साँसें तुझसे जुड़ती हैं,
किस पगडंडी को कोसूं मैं
हर राह तेरे कूचे मुड़ती है
टुकड़े कर दो तो भी इनायत
जुड़ने का हक़ तो मुझे दे दो,
जीने का हुनर तुम रख लो
चाहने की इजाज़त मुझे दे दो,
पाने की तमन्ना तेरा हक़ है
खोने का हक़ तो मुझे दे दो।
(निर्मल अगस्त्य)
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