"हम सभी बाट जोहते हैं"
चाँद, सितारे, आकाश, धरती...
अनुरोध, क्रोध, वेदना और सौंदर्य!
सभी बाट ही तो जोहते हैं।
प्रशन्सा की, मुक्ति की,
आयामों की और एक हाँ भर की!
जीवन, मृत्यु, संघर्ष, आक्षेप.... सभी।
परछाई, प्रारब्ध, शब्द...
कवितायें और उनके अर्थ!
बाट जोहते हैं
अपने अस्तित्व के मुकम्मल होने की।
कुछ होने और कुछ नहीं होने के अन्तराल में
सारी सारी सृष्टि बाट जोहती है।
प्रेम, दर्शन, प्रार्थना ओर प्रश्न,
स्वीकृति की बाट जोहते हैं।
इसमें नया कुछ भी नहीं है!
बाट जोहना तो
विधना का एक मौलिक सूत्र है
जिसमें विधाता भी बन्धा है।
कोई विशेष उपक्रम आवश्यक नहीं है
इस बात पर कि मेरे होने
और मेरे नहीं होने का जो अन्तराल है
वह तुम भी हो सकते हो,
एक सपना भी हो सकता है,
पिछले जन्म के अनुराग से अनुबन्धित
कोई आकृति भी हो सकती है!
एक यक़ीन, एक अनय, एक प्रायश्चित
या एक संकोच!
मैं और मेरी कविता...
उस संकोच के टूटने की बाट जोहते हैं।
(निर्मल अगस्त्य)
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