Wednesday, December 28, 2016

‘‘मुझ से तो रंडी भली’’

  "कहानी"                      ‘‘मुझ से तो रंडी भली’’                         "निर्मल अगस्त्य"                                                            
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 ‘‘चाय छत पर लेते आना!’’ इतना कह कर सुबोध अख़बार लिये सीढ़ी घर की तरफ़ बढ़ गया। सिगरेट और माचिस उसने बाँये हाथ में ऐसे दबा रखा था कि दिखाई न दे। बाबूजी डायनिंग टेबल के पास रखी चौकी पर बैठ कर अखबार के साथ दी जाने वाली पत्रिका पढ़ रहे थे। आँख उठा के नहीं देखा। जानते हैं कि सुबोध रोज़ सबेरे चाय के साथ एक सिगरेट पीता है। किसी ने बताया होगा या कभी देख लिया होगा। दोनों अनुमानों से अहम बात तो यह है कि सीढ़ीघर के चौताल पर सिगरेट पीने की बाद सुबोध टोंटी को वहीं पानी की टंकी के बगल में फेंकता है जिसे उसकी पत्नि सप्ताह में एक बार साफ़ कर देती है। तो जब साक्षात राम बता रहे हैं तो हनुमान और लक्ष्मण से क्या जिरह करना। अंगद, सुग्रीव से क्या पूछना। कंगन हाथ में है और मुहावरा ऐसे ही थोड़े न बना है कि हाथ कंगन को आरसी क्या, पढ़े लिखे को फ़ारसी क्या!
     सुबोध की यही आदत ख़राब है जो उसे भी लगती है लेकिन कुछ नहीं कर सकता। सुबह उठने का बाद सबसे पहला वाक्य चिल्ला के ही बोलेगा- ‘‘चाय छत पर लेते आना।’’
     क्यूँ चिल्लाता है सुबह उठते ही, कोई नहीं कह सकता। दूर के एक बहनोई ने कहा कि यह अधकपारी के कारण हो रहा है। सुबोध को अधकपारी है। माईग्रेन! आधासीसी का दर्द! कई नाम हैं उस दर्द के लेकिन परिणाम एक ही है। बारह घन्टे का असहनीय दर्द। कलकत्ता में एक दोस्त हुआ करता था उसका- शैवाल गुहा। कहता था कि माईग्रेन उसी व्यक्ति को सताता है जिसकी यौन इच्छा पूरी नहीं हो पाती। अब सुबोध की कोई इच्छा नहीं है। वसुन्धरा की शादी हो जाने के बाद उसकी सारी इच्छायें मर गईं। वह खा लेता है, पी लेता है, सो लेता है, जी लेता है, पत्नि के साथ साहचर्य कर लेता है, ये अलग बात है लेकिन किसी इच्छा के वशीभूत होकर नहीं करता ये सब। सब करते हैं तो वो भी कर लेता है। सब खाते-पीते हैं तो वो भी खा, पी और सो लेता है। चुँकि शरीर के स्तर पर सक्षम है तो साहचर्य भी कर लेता है लेकिन उसकी कोई यौन इच्छा नहीं है। कम से कम अलग से तो नहीं। कल रात उसे लगा कि गरदन पर छिपकली रेंग रही है। अधनींदीं में बाँये हाथ से गरदन पर तेज़ी से हाथ फेरा तो पाया पत्नि गुदगुदी कर रही है। पत्नि जाग रही थी। अच्छे मूड में थी। कुछ कहना चाह रही थी। वह फिर से सोने की कोशिश करने लगा मानों पत्नि का हाथ गरदन पर ग़लती से चला गया हो। दो मिनट बाद छिपकली फिर वापस आई और कई बार आई। नतीजा वही हुआ जो हर रात होता रहा था लेकिन उसकी कोई अतिरिक्त यौन इच्छा नहीं है, बिल्कुल भी नही!
     लेकिन, क्या कोई ऐसा प्राणी हो सकता है जिसकी माँ न हो। कोई ऐसा जीवन हो सकता है जहाँ पानी न हो। क्या कोई ऐसी धरा हो सकती है जिसके लिये अम्बर न हो। क्या कोई ऐसा पहलू हो सकता है जिसका दूसरा पहलू न हो? ऐसा कैसे हो सकता है कि सुबोध इच्छाविहीन हो। है उसकी एक इच्छा। कार या एस.यू.वी. में घूमने की इच्छा नहीं। न ही किसी अपार्टमेन्ट के मालिक बन जाने की इच्छा। इच्छा है नाम कमाने की। वो भी साहित्य में नाम कमाने की। आलमारियाँ भरी पड़ी हैं। किताबों और पन्नों के अम्बार के बीच वह जीता चला आ रहा है। उस अम्बार में उसकी लिखी कई कहानियाँ, हज़ारों कवितायें और सैकड़ों लेख भी धूल फाँक रहे हैं।
     जवानी के दिनों में कहीं-कहीं दो-चार छप भी गया था। लेकिन पिछले दस सालों से कहीं कोई नहीं छाप रहा। बस तीन साल पहले एक कविता संग्रह छपा था, वो भी पैसा देकर। सम्पादक को क्या अच्छा लगेगा ये तो समझना ज़रा मुश्किल है। प्रकाशक आजकल पैसे माँगने लगे हैं। इससे तो रंडियाँ अच्छी हैं जिन्हें पहले डील से ही पेमेन्ट मिलने लगता है। अब साहित्य के मैदान में एक नई परम्परा शुरू हुई है। अपने को प्रमोट करने की बाज़ारू परम्परा। प्रकाशक बस आपकी लिखी चीज़ को बेच-बेच के खायेगा और आपको पता भी नहीं चलना कि वास्तव में कितनी प्रतियाँ   बिकी हंै। आपसे जितना रूपया लेगा, उसके आधे का किताब छापेगा और दस या बीस प्रति आपको पकड़ा देगा। फिर कान में तेल डालकर सो जायेगा। करते रहिये फ़ोन पर फ़ोन। बाक़ी आधे रूपये अपने खाते में डाल कर निश्चिन्त हो जायेगा। सो कुछ साल पहले एक अमेरिकन यूरोपयिन काॅन्सेप्ट आया। प्रमोशन और मार्केटिंग का काॅन्सेप्ट। वो भी लेखक के पैसे से। और वो भी प्रकाशन ख़र्च का पाँच से दस गुना। अगर आप प्रमोशन और मार्केटिंग के लिये पैसा देंगे तो प्रकाशक आपकी किताब दुकानों में, लाईब्रेरियों में और स्कूल, काॅलेजों और विश्वविद्यालयों में भेजेगा। गूगल और सोशल मीडिया पर बतायेगा। इन्टरनेट कैम्पेनिंग करेगा, समालोचना करवायेगा और तब आप लोगों तक पहुंचेंगे और तब आप पढे़ जायेंगे, प्रशंसित होंगे और नाम कमायेंगे। बात अच्छा लिखने की नहीं है, बात है कि जब आपकी किताब प्रकाशक के गोदाम में ही दफ़न कर दी जा रही है तो पाठकों को ये निर्णय करने का मौक़ा मिल कहाँ रहा है कि आप कैसा लिखते हैं। जंगल में मोर नाचा वाला मुहावरा ऐसे ही थोड़े न बना है और मोर को जंगल से रिहायश और आबादी वाले इलाके में आने के लिये पैसा चाहिये, ढे़र सारा पैसा! धप-धप की आवाज़ हुई। पत्नि चाय लेकर उपर आ रही थी। वह अखबार में घुसने की कोशिश करने लगा। आजकल उसे ख़बरों का ओर-छोर समझ में नही आता है और हमेशा कोई पैराग्राफ़ पढ़ते-पढ़ते बीच में ही पन्ना बदल देता है। पत्नि ने चैताल की दीवाल में बने ताखे पर चाय रखते हुये पूछा- अभी कहाँ निकलना है?
     ‘‘अरे जाओ न यहाँ से। माथा चाटती रहती हो।’’ 
     इतना बोल कर वह सिगरेट सुलगाने लगा। पत्नि वहीं अलगनी में टँगे कपडे़ उतारने लगी। अभी छिपकली दिवस निष्क्रियता में है। रात को जागती है, बस्सऽऽऽ...! अच्छा मूड, रात को ही होता है। सपने की बात रात में होती है।
     एक घन्टे बाद सुबोध नाश्ता कर पैन्ट पहन रहा था कि बाबूजी पूछ बैठे-
     ‘‘बोरिंग रोड जा रहे हो क्या?’’
     ‘‘नहीं, काहे?’’ - सुबोध बोला।
     बाबूजी कुछ बोले नहीं। वापस डायनिंग रूम में जाकर बैठ गये। कपडे़ पहन कर सुबोध वहीं से बोला-
     ‘‘जा रहे हैं ज़रा राजेन्द्र नगर। मृणाल शर्मा मनोहर जी से मिलने।’’
     बाबूजी प्रत्युत्तर में कुछ नहीं बोले। जब बाबूजी कुछ नहीं कहते तब उसकी बताने की इच्छा और ज़्यादा हो जाती है। पैन्ट का बटन लगाते हुये डायनिंग रूम में गया।
     ‘‘वो पुरुषोत्तम ने बुलाया है। टाईम ले रखा है मनोहर जी से। उन्होंने कुछ आश्वासन सा दिया था पिछली बार। बोले कि अपने प्रकाशक से बात करेंगे और पैसा नहीं लगने देंगे। उस प्रकाशन का मार्केटिंग अच्छा है इसलिये उसी से छपवाने का सोच रहे हैं।’’
     तभी बाबूजी बोले-
     ‘‘और तुम्हारा कविता संग्रह जो छापा था, समर प्रकाशन, वो नहीं छापेगा क्या? पिछली बार तो उसने तुमसे कहा था कि कविता संग्रह है इसलिये पैसा ले रहे हैं। उपन्यास या कहानी संग्रह होगा तो नहीं लेंगे।‘‘
     वह जूता लाने बरामदे पर चला गया। कुछ पलों बाद डायनिंग टेबल के पास लगी एक कुर्सी पर बैठ जूता पहनने लगा और बोला-
     ‘‘उसका न तो मार्केटिंग अच्छा है न नियत। मुझे तो ये भी नहीं पता कि कितना काॅपी छापा है। बस पचास काॅपी हमको दे कर निश्चिन्त हो गया। जब भी फोन किया तो उसने कहा कि एक भी नहीं बिकी। ये विश्वास करने लायक बात ही नहीं है। दुनिया में ख़राब से ख़राब किताब की भी कुछ न कुछ काॅपी बिक ही जाती है। मनोहर जी ने कहा है कि उनके प्रकाशक की बाज़ार पर पकड़ बहुत अच्छी है। कोई भी किताब हो पाँच-दस हज़ार काॅपी खपत करवा ही देता है।’’
     बाबूजी पालथी मार कर बैठे थे। थोड़ा आगे झुक गये और कुहनी को घुटने से टिका कर बाँये हाथ को ललाट पर रख कर बोले-
     ‘‘अरे! बहुत पेंच है इन सबों में। पटना युनिवर्सिटी में प्रोफ़ेसर होते तो तुम्हारा भी छपता। किसी लाॅबी में तो तुम हो नहीं। हज़ारों लिखने वाले हैं और पढ़ने वाला अब कोई नहीं है। अपनी रचना, अपनी संस्था, अपनी लाॅबी, अपना अवार्ड आपस में ही बाँट रहे हैं और एक दूसरे की पीठ थपथपा रहे हैं। कोई भोपाल की लाॅबी में है, कोई इलाहाबाद की लाॅबी में है तो कोई दिल्ली की लाॅबी में है। जी नहीं पाओगें साहित्य रच के। अपने लिये कुछ सोचो अब।’’
     ‘कुछ और सोचो!’ बस इसी के बाद सम्वाद ख़त्म या सम्वाद का दूसरा दौर शुरू। अगर शुरू हुआ तो सुबोध फिर चिल्लायेगा। लेकिन उसे मनोहर जी से मिलने जाना है। अभी इस बहस में पड़ना मुनासिब नहीं लग रहा है। बाबूजी अपनी जगह सही हैं। लेकिन उनका सही रहना साहित्य की दुनिया का कितना बड़ा दुर्भाग्य है कि साहित्यकारों का जीवन साहित्य से नहीं बल्कि किसी और स्रोत से चल रहा है। सुबोध पिताजी को ग़लत होते देखना चाहता है और वो भी उनके जीते जी।
     अनिसाबाद में लाल मन्दिर के पहले उसकी मोटरसाईकिल, घुरघुरा के बन्द हो गई। गाड़ी रिर्ज़व में आई थी। अब तेल लेने बोरिंग रोड जाना पडे़गा। अनिसाबाद के दोनों पेट्रोल पम्प चोर हैं  आधा-आधी तो नहीं लेकिन कम से कम एक चैथाई किरासन तेल तो ज़रूर मिलाते हैं दोनो। धुँआ भी ज्यादा देने लगती है गाड़ी। इन्जन पेट्रोल के लिये बनाया गया है, किरासन तेल के लिये नहीं। पेट्रोल के लिये बना इन्जन किरासन तेल पूरी तरह जला नहीं पाता तो धुँआ निकलना लाज़िमी है। तेल का टैप रिज़र्व में कर किक मारने को हुआ कि विनोद यादव दिखा। एकदम चकाचक। पहली बार जूता पहने दिखा। इससे पहले हमेशा सैंडल या हवाई चप्पल में ही दिखता रहा था।
     ‘‘अरे सुबोध भाई! क्या हो गया?’’ - उसने चहकते हुये कहा -
     ‘‘बस रिर्जव में आ गया था। तुम इधर?’’
     ‘‘हाँ आये थे पोस्ट आॅफिस। सुकन्या सम्वर्धन योजना में पैसा डालने। बेटी आजे तीन साल की हुई है।’’
     ‘‘वाह! बढ़िया है! तब क्या चल रहा है आजकल?’’
     ‘‘वही सब! स्क्रिप्ट, कहानी, डाॅयलाॅग और क्या? अभी मुरली सिन्हा का दो फिल्म किये हैं। एक तो रिलीज हुआ चार महीना पहले- ‘प्रेम ना रही त कुछौ ना रही।’ और एक रिलीज होने वाला है। ऊ भी मुरलिये सिन्हा का है- ‘दीदी के देवर बड़का सयाना।’’
     फिर दोनों साथ चल पडे़। सुबोध को जी.पी.ओ. तक जाना था। रास्ते में विनोद अपनी लिखी फ़िल्मों की कहानी सुनाता रहा। सुबोध मुस्कुराता रहा। वही ठाकुर, वही हवेली, वही घास गढ़ने वाली की बेटी, वही नीची जात का लड़का और वही ठाकुर का आवारा, लड़कीबाज, दारूबाज बेटा। एक बार सुबोध ने शिवराम शानू को एक कहानी दी थी। शिवराम ने सुनने के एक सेकेन्ड बाद ख़ारिज कर दिया। उसने कहा कि गाँव के लिये ऐसी कहानी नहीं चलेगी। फिर सुबोध ने पूछा था -
     ‘‘कैसी कहानी चलेगी।’’
     ‘‘देखिये, आपको हम एक सिचुएशन देते हैं। उसको आप इन्लार्ज कीजिये। एक गांव है। उसमें एक गरीब किसान है, जिसकी एक बहुत सुन्दर बेटी है। उसी गांव में एक छोटे जात का लड़का है। बड़ा होनहार है... एक ठाकुर भी है... उसका एक बेटा है... दारूबाज... रंडीबाज़...लफुआ...!’’
     तब तक जी.पी.ओ. गोलम्बर आ गया और सुबोध की याददाश्त का वो कोना भी वापस चला आया जो शिवराम शानू एपिसोड में चला गया था। विनोद की गाड़ी चल  पड़ी है। काम मिलने लगा है। बतौर स्क्रिप्ट राईटर और कहानीकार, चार फ़िल्में और मिली हैं उसे। पिच्च से थूकने की आदत गई नहीं विनोद की। ओ.के. बाय बोलकर उसने पिच्च से थूका और अशोक सिनेमा की तरफ़ बढ़ गया। आजकल रिवाईव स्टुडियों में इन सबका जमावड़ा लग रहा है।
     सुबोध दस मिनट के बाद राजेन्द्र नगर पहुँच गया। पुरुषोत्तम अपने आॅफ़िस में था। बचपन का दोस्त। सुख का रहे न रहे लेकिन दुःख का साथी ज़रूर है। बहुत बड़ा आदमी हो गया पुरुषोत्तम लेकिन उस कृष्ण की तरह है जो अपने सुदामा जैसे मित्र की मदद के लिये हर समय तैयार रहता है। अभी पाँच बड़ी कम्पनी का डिस्ट्रीब्यूटर है। तीन-तीन मकान है। एक अपार्टमेन्ट है। दो स्कूल है लेकिन अपने दोस्त के लिये आज भी वही पुरुषोत्तम है जो अपनी बेरोज़गारी के दिनों में हुआ करता था।
     पुरुषोत्तम ने मृणाल शर्मा मनोहर के बेटे को फोन लगाया। अपने ही अपार्टमेन्ट के जिस फ्लैट में पुरुषोत्तम रहता है, उसी के उपर मनोहर जी सपरिवार रहते हैं। फ़्लैट में वह जानबूझ कर रहता है। अपार्टमेंट में सुरक्षा ज़्यादा रहती है। दो मकान किराये पर लगे हैं।                             एक में हाॅस्टल चलता है और दूसरे में एक कोचिंग। तीसरा मकान उसका आरामगाह है जहाँ वह केवल रविवार को जाता है।
     ‘‘पापा सोये नहीं हैं ना।’’
     उधर से मनोहर जी के बेटे ने कहा- ‘‘नहीं। आपलोगों का ही इन्तज़ार कर रहे हैं।’’
     फिर दोनों चल पड़े। पुरुषोत्तम की हिन्दी भी बहुत अच्छी है। कभी-कभी कुछ लिखता भी है लेकिन व्यापार की व्यस्तताओं के कारण बहुत समय नहीं दे पाता। वह सुबोध की आगे बढ़ते देखना चाहता है। ख़ासकर उसके भीतर के साहित्यकार को आगे बढ़ाने के लिये वह भरसक कोशिश भी करता रहता है। पिछले कविता संग्रह के लिये उसी ने पैसा दिया था। सुबोध की ज़िन्दगी में कुछ ऐसे मसले आते रहे कि तीन साल पहले छपे उस किताब का आज तक विमोचन भी नहीं हो पाया। एक बार वह विनित अग्रवाल से मिला भी था। विनीत ने विमोचन का कुछ ऐसा ख़र्च बताया कि उसकी हिम्मत टूट गई। कविता कोई नहीं पढ़ता अब। सौ, दो सौ काॅपी तो विमोचन में ही बँट जायेगी। विमोचन में आया हर अतिथि उस मुफ़्त की किताब का क़दरदान होता है, कम से कम घर ले जाकर रैक में सजा देने तक। फिर जब तक किसी बड़े कवि को नहीं बुलाया जाये तब तक मीडिया कवरेज़ भी ठीक-ठाक नहीं मिलेगा। संवाददाताओं और पत्रकारों को मुर्गा-दारू और गिफ़्ट की भाषा समझ में आती है। नगद की भाषा तो सर्वव्यापी रूप से समझ में आती है। नगद की भाषा में फ़ोनेटिक्स और इटमलाॅजी फेल हो जाती है। किसी व्याकरण की ज़रूरत नहीं होती। उच्चारण दोष भी नहीं लगता। नुक्ता नाम का यक्ष कोई सवाल नहीं पूछता। जोड़ने पर पता चला कि कम से कम लाख, डेढ़ लाख का ख़र्च है। वो भी साधारण रूप से विमोचन करवाने के लिये। एकदम सादा-सादी! और तब भी कोई गारन्टी नहीं है कि इस कविता संग्रह को एक मुक़ाम मिल ही जाये। इसके बाद दूसरा चक्रव्यूह शुरू होगा। समीक्षा और समालोचना का। कौन लिखेगा समीक्षा? सभी पत्रिका और अख़बार वाले दो-दो काॅपी लेकर अपने-अपने आॅफ़िस की लाइब्रेरी में रखवा देंगे। उसके लिये लगना होगा। खुशामद करनी होगी। एक नेटवर्किंग करनी होगी। डेस्क इडीटर को अनुगृहित करना होगा। ऐसा न हो कि एक समीक्षा आज छपी और दूसरी छः महीने बाद। इसका कोई फायदा नहीं। अगर तीन महीने के भीतर सभी महत्त्वपूर्ण पत्रिकाओं और अख़बारों में समीक्षा एक एक कर आती रहे तो आपका और आपकी किताब का कुछ हो सकता है।
     सुबोध उस समय मन ही मन बोला - ‘‘मुझ से तो रन्डी भली।’’ वह पुरानी हो जाती है तब लोग समीक्षा और आलोचना करते हैं। यहाँ पहले प्रयास से ही समीक्षा और समालोचना शुरू हो जाती है। अगर लेखक असक्षम है तो वो भी नहीं होता। बस परीक्षा और आलोचना होती है। समीक्षा और समालोचना तो नामवर लेखकें की किताबों की होती है।
     मनोहर जी के बेटे मुरलीकृष्ण ने दरवाज़ा खोला। पाँच मिनट बाद मनोहर जी बैठक में आये। पहले पुरुषोत्तम की तरफ़ देखा। दुआ-सलाम हुई। बड़ी अजीब बात नोटिस की सुबोध ने। एक सहज भाव के तहत नाई पहले नाई को देखता है और धोबी-धोबी को  चाहे वे नाई या धोबी आज जीवन का पहला ही काम  कर के क्युँ न आये हों लेकिन स्थापित हो चुके साहित्कार मनोहर जी नवोदित साहित्यकार सुबोध की तरफ़ देख भी नहीं रहे थे। सिर्फ पुरुषोत्तम से बतिया रहे थे। बर्फ़ कितना सहेगा। कभी न कभी उसको पिघल ही जाना है। दस मिनट के बाद मनोहर जी उसकी और देख कर बोले-
     ‘‘और क्या हाल है साहित्यकार?’’
     ‘‘जी बस ठीक है।’’
     ‘‘तब क्या हो रहा है? कैसा गयी परीक्षा।’’
     ‘‘चाचा जी परीक्षा क्या। बस बाबूजी की ख़ुशी के लिये थे सब कर रहा हूँ।’’
     ‘‘काहे, ऐसा काहे, बोलते हैं। नौकरी मिलने से किस बेरोजगार को दुःख होता है।’’
     पुरुषोत्तम से रहा न गया। ‘‘बात नौकरी की नहीं है चाचा जी। बात मन लायक नौकरी की है। क्या करेगा सचिवालय में असिस्टेन्ट बन के? नौकरी से परहेज़ नहीं है लेकिन काम साहित्य से जुड़ा हो तो कुछ मज़ा आये।’’
     ‘‘हाँ, ठीक है, लेकिन जो मिले पहले कर लेना चाहिये। है की नहीं? हम्हीं को देखिये। कहाँ से कहाँ आ गये। कहाँ दरभंगा में इतिहास का प्रोफेसरी करते थे और रिटायर हुये राजभाषा विभाग से। तनखा मिलते रहता है और पेट भरा रहता है तो हर समय कहानी सुझता है। बिहार गौरमेंट में कामे कितना करना पड़ता है। एक बार पाँव जमा लीजिये फिर करते रहिये साहित्य सृजन।’’
     सुबोध को ऐसा लगा कि दूर कहीं एक पलंग अपने ही बोझ से चरमरा रहा हो। अन्दर से यह आदमी नौकर है और बाहर से सृजनशील तभी आज तक फणीश्वर नाथ रेणु के कैनवाॅस से निकल नहीं पाया। हर कहानी, हर उपन्यास में एक ही शिल्प, एक ही तरह का कथानक, रेणु की तरह की ट्रीटमेन्ट और उन्हीं के तरह के चरित्र। कितना पीछे है यह आदमी। अपनी ही बोझ से चरमराया हुआ है फिर भी सम्पादक और प्रकाशक इसी को छापते हैं। कैसी बिडम्बना है कि इतना प्रसिद्ध साहित्यकार रेणु की छाया से बाहर आ ही नहीं पाया। पद का लाभ खूब उठाया इन्होंने। दिल की आवाज़ बड़ी दूर तक जाती है। इनका दिल बोल रहा है कि प्रोफेसर होने और राजभाषा विभाग में निदेशक होने से इनको पहुँच अच्छी मिली। सम्पादकों और प्रकाशकों को अनुगृहित करने के अनेकों अवसर मिलें।
     तब तक चाय आ गई।
     ‘‘खैर, छोड़िये इ सब। कुछ लिखे हैं कि नहीं इधर, कविता के अलावा।’’ मनोहर जी सोफ़े पर लेटते हुये बोले।
     ‘‘हाँ, इधर बहुत कुछ। एक कविता संग्रह, एक कहानी संग्रह कम्पलीट है। इधर व्यंग्य में हाथ लगाये हुये हैं।’’
     ‘‘अच्छा, लाये हैं कुछ।’’ मनोहर जी उठ कर चाय लेते हुये बोले।
     ‘‘हाँ! कुछ व्यंग्य लाये हैं।’’ सुबोध ने साथ लाये पाॅलिबैग से ए-फ़ोर के आकार का एक टाईप किये हुये काग़ज़ का बन्डल निकालते हुये कहा।
     ‘‘किस तरह का व्यंग्य है।’’ मनोहर जी चाय की पहली चुस्की लेते हुये बोले।
     कन्टेम्प्रोरी है। छोटा-छोटा है। तीन-तीन, चार-चार पेज़ का। सोशल पाॅलिटिकल, सब है इसमें। अमेरिका का चाल चलन भी है। मोदी, केजरीवाल, लालू, नीतीश भी है। अतरंगी लोगों का अतरंगी व्यवहार भी है।’’
     ‘‘कोई सुनाईये एक छोटा सा।’’-मनोहर जी गम्भीर होकर बोले।
     सुबोध व्यंग्य छाँटने लगा। बड़ा मुश्किल होता है कोई एक चुन के सुनाना। जिसने लिखा हो, उसके लिये चुनना तो और भी मुश्किल होता है। फिर भी उसने एक लेख चुना- ‘बकरी चढ़ी पहाड़ पर’ और सुनाना शुरू किया। तभी मनोहर जी के लड़के मुरली का मोबाईल बजा और वह उठ कर भीतर कमरे में चला गया। मनोहर जी बोले -
     ‘‘शुरू कीजिये।’’
     ‘‘मुरली जी को आ जाने दीजिये। वो भी सुनेंगे तो अच्छा रहेगा।’’ सुबोध उनकी ओर देख कर मुस्कुरा के बोला। तब मनोहर जी थोड़ा अनमनयस्क से बोले-
     ‘‘अरे छोड़िये, ऊ क्या सुनेगा। समझता कूच्छो नहीं है और बोलता बहुत है। हिन्दी लेकर तीन बार यू.पी.एस.सी. क्या दे दिया है, अपने को हजारी प्रसाद द्विवेदी समझता है।’’
     सुबोध शुरू हो गया - ‘बकरी चढ़ी पहाड़ पर।’ एक पन्ना ख़त्म होने के बाद मुरली भी वापस आया और बैठ कर सबके साथ-साथ सुनने लगा। थोड़ी देर में चाय और व्यंग्य एक साथ ख़त्म हो गये। सुबोध बीच-बीच में तीनों से निगाहें मिलाता रहा ताकि पता चलता रहे कि दिलचस्पी ख़त्म तो नहीं हो रही। तीनों के चेहरे पर मुस्कुराहट और हँसी के बीच का भाव था। थोड़ा भी बढ़ जाये तो हँसी और थोड़ा भी घट जाये तो मुस्कुराहट।
     मनोहर जी पुरुषोत्तम की ओर देख कर बोले-
     ‘‘बहुत अच्छा है। क्या कहते हैं आप?’’ लेकिन पुरुषोत्तम के कुछ कहने से पहले ही मुरली बीच में बोला - ‘‘अच्छा, आपको ऐसा नहीं लगता कि आपने इसमें बहुत सी बातों का समावेश कर दिया है?’’
     ‘‘तो, ये तो अच्छी बात है न।’’ पुरुषोत्तम बोला। मुरली, पुरुषोत्तम  का मुँह देख कर मुस्कुराया।
     ‘‘नहीं, मेरा कहने का मतलब बात कहाँ से शुरू हुई और कहाँ पे ख़त्म हुई। ख़त्म तो ठीक हुई। बात का मतलब भी समझ में आया। लेकिन वो पन्चतन्त्र सरीखा प्रीफ़ेस, फिर बाद में केजरी, मोदी और भी न जाने क्या क्या...। मतलब, थोड़ी बातें छोड़ी जा सकती थी इसमें।’’
     मनोहर जी थोड़ा उबा हुआ सा भाव लेकर मुरली को देखने लगे।
     ‘‘एक्चुअली, आप पहला पेज़ मिस कर गये थे इसलिये। पन्चतन्त्र टाईप की कहानी से जो शुरूआत हुई थी उसे आपने बीच से सुना और वैसे भी आप देखिये, हर न्यूज़ चैनल पर एक चार लाईन के न्युज़ को चार घन्टे तक दिखाया जाता है। फिर रात में रिपीट टेलिकास्ट भी किया जाता है। लोग, ख़ासकर के राइटर्स एकदम अपंग जैसे होते जा रहे हैं। किसी के पास नया काॅन्टेन्ट नहीं है। एक ही काॅन्टेन्ट को नये-नये मसाले में लपेट कर परोस रहे हैं और एक मेरा दोस्त है, जो एक काॅन्टेन्ट में, एक ब्लाॅग में या एक लेख मैं सौ पहलुओं पर विचार कर ले रहा है। हर बार एक नई चीज़ ला रहा है। इसमें ख़राबी क्या है?’’ पुरुषोत्तम ने इतनी देर में पहली बार बेचैनी से कहा।
     तब मनोहर जी मुरली को और देख कर बोले- ‘‘तुमको याद है उसका, ऊ सुनील प्रभाकर।’’
     मुरली एकदम से चहक कर बोला - हाँ, हाँ, वही न, जो बंगलोर चले गये।’’
     तब मनोहर जी सुबोध की ओर देखते हुये बोले- ‘‘एक्चुअली, आप बहुत एक्सपेरीमेन्टल टाईप के लेखक हैं। आपकी राइटिंग में ढ़र्रा नहीं होता है। आपकी कविता की किताब हम पढे़, बेजोड़ एक्सपेरिमेन्ट है उसमें भी। आपकी वो दोनों कहानियाँ भी पढे़, जो आप दे गये थे। उन दोनों में भी एक्सपेरिमेन्ट हैं। अभी जिसका नाम लिये, सुनील प्रभाकर, वो भी वैसा ही राईटर था। तरह-तरह का एक्सपेरिमेन्ट करता था! अच्छा लिखता था। आपका ट्रीटमेन्ट भी अलग तरह का रहता है जैसा सुनील प्रभाकर का रहता था।’’
     सुबोध और पुरुषोत्तम एक दुसरे को देख कर मुस्कुराये।
     ‘‘दिक्कत क्या है सुबोध जी कि जो आप लिख रहे हैं, वो अभी हिन्दी साहित्य का स्तर नहीं है। ये स्तर आयेगा, लेकिन दस पन्द्रह साल के बाद। अभी एकदम स्ट्रेट फारवर्ड कहानी चलती है। स्ट्रटे फारवर्ड व्यंग्य चलता है। मन मार के रिपोर्टर जैसा लिखना पड़ता है। पाठक है ही नहीं अब। इतना टेन्सन है लोगों के जीवन में कि कोई दिमाग नहीं लगाना चाहता। पढ़ा, समझा और भूल गये। फिर वैसा ही कुछ पढ़ा, समझा और भूल गये। आपका कैनवास बड़ा है। सोच में मार्डनिज्म बहुत ज्यादा है। अब जो साहित्य पढ़ने वाले बचे हैं उनमें से नब्बों लोगों को आपका वो सब लिखा समझ में नहीं आयेगा, जो आप इस व्यंग्य में यूज किये हैं।’’
     मुरली बीच में बोला - ‘‘हाँ, वो जो तुलना है सेलेराॅन प्रोसेसर वाला और वो वाला कि फ़ेसबुक पर लाॅगिन किये, थोड़ा गीला किये थोड़ा सूखा किये और लाॅग आऊट हो गये वाला।’’
     मनोहर जी बीच में बोले - ‘‘हाँ ऐसा ही सब। अब हम्हीं नहीं जानते हैं कि सेलरौन क्या है, प्रोसेसर किसको कहते हैं और लाॅग इन, लाॅग आऊट क्या होता है जबकि हम दिन रात पढ़ते ही रहते हैं। महीना में तीस-पैंतीस गो मैगजीन मंगाते हैं सब पढ़ जाते हैं।’’
    पुरुषोत्तम असहज हो रहा था। सुबोध मुँह पर निर्विकार भाव लिये तो था लेकिन अन्दर से बैचैन हो रहा था। कैसे राईटर हैं ये। अपडेट रहने का मतलब नहीं समझते। अगर कोई रिटायर्ड पेन्शनधारी सेनसेक्स, डीमैट, क्वारनटाईन, सेलेराॅन, आई-सेवन, एच-फाईव-एन-वन, पी.सी., फ़ेसबुक का मतलब न समझे तो माफी के लायक है लेकिन एक आदमी जो खुद को राईटर कहता है और जिनको दुनिया पढ़ती है और अनुसरण करती है अगर वो न समझे तब तो हिन्दी साहित्य की दुनिया सचमुच ख़तरे में हैं। उस हिसाब से तो सही में हम अंग्रेजी साहित्य के पिछलग्गु हैं और यही हिसाब रह गया तो हम सदियों तक पिछलग्गु ही रह जायेंगे। पाठक हैं नहीं या पाठक को हिन्दी साहित्य से विरवत किया जा रहा है? अभी भी जर, जोरू, ज़मीन और राजनीति से हट के लिखने वाले बहुत कम हैं और कुछ रिश्तों पर लिखने वाले हैं। एकदम फ़ाॅरमेट में लिख रहे हैं लेखक। जहाँ कहानी में तकनीक की बात या इन्टरनेट की बात हुई नहीं कि आलोचक, समालोचक, परीक्षक, समीक्षक उस तीसरे क्लास के बच्चे की तरह छटपटाने लगते हैं जिससे विद्यालय निरीक्षक ने संवेग के संरक्षण का सिद्धान्त पूछ दिया हो। न तो लेखक अपडेट हो रहा है न ही समालोचक। वही ठाकुर, वही उसकी रखैल, वही रखैल की बेटी, बेटी का मन्त्री बनना, ठाकुर के बेटे का सप्लायर बनना, लड़की या लड़के में से किसी एक का नीची जाती का होना। हर कहानी में एक औरत का एंगल चला ही आता है। एक लेखक का सृजन मसालों पर क्यूँ निर्भर होता जा रहा है, समझ के नहीं आता, वो भी वही आठ दशक पुराने मसाले। फिर भी शिकायत है कि पाठक नहीं हैं। कहाँ से रहेंगे पाठक। नई सोच और नई क़लम को जगह मिल नहीं रही। टाइपराईटर के ज़माने के लेखक बदस्तूर वमन करने में लगे हैं। संगीत बदल गया है, लिबास बदल गया है, सोच बदल रहीं है। भारत में लगभग सनतानवे करोड़ लोग मोबाईल का इस्तेमाल कर रहे हैं और उनमें से इक्कीस करोड़ लोग मोबाईल पर इन्टरनेट का इस्तेमाल कर रहे हैं। घड़ी की उपस्थिति विलुप्तप्राय प्राणी की तरह हो गई है। चिट्ठी लिखे और पढे़ ज़माना हो गया है। इन्टरनेट, हर शहरी आदमी के जीवन में दस्तक दे चुका है और अब भी वही ठाकुर, उसका रंडीबाज़ बेटा, नीची जात की लड़की, जातिय संघर्ष। सच तो यह है कि किताब खरीदने वाला और मजबुरी के अलावा कुछ पढ़ने वाला, ख़ास कर साहित्य, सर्वहारा वर्ग से है ही नहीं। कौन पढ़ता है साहित्य? कौन किताब में पैसे ख़र्च करता है ये विचार करने वाली बात है? अब जो वर्ग किताब के लिये पैसे ख़र्च कर रहा है उसको आप आठ दशक से चले आ रहे फ़ार्मेट को नये-नये मसाले में लपेट के परोस रहे हैं। तब वो क्यूँ पढे़गा? वो तो आॅडियो-विज़ुअल माध्यमों की तरफ़ भागेगा ही और आप शिकायत करते हैं कि पाठक नहीं है। हैं पाठक, लेकिन अब वो आॅडियो-विज़ुअल माध्यमों की तरफ़ और अंग्रेजी साहित्य की तरफ़ प्रयाण कर रहे हैं। एक्सपेरीमेन्ट का मज़ा ले रहे हैं। जब रूपया लगाना ही है तो बासी में क्युँ लगायें। अगर काॅलेज़, स्कूल, विद्यालय, महाविद्यालय और सरकारी संस्थाओं में किताबें खपाने का प्रचलन बन्द हो जाये तो किसी भी लेखक की पाँच सौ किताब भी नहीं बिक पायेगी और अगर बासी ही पढ़ना है तो प्रेमचन्द जैसे लाजबाब लेखकों की कृति तो हर महीने पुर्नमुद्रित हो रही रही है। सेलेब्रिटी फ़ैक्टर भी कोई चीज़ होती है कि नहीं।
     ‘‘चाचा जी, मैं आपकी बात पर गर्वान्वित महसूस करता हूँ।’’ सुबोध थोड़ा आगे झुक कर बोला। मनोहर जी उसे ध्यान से देखने लगे।
     ‘‘मान लीजिये मैं सबकी तरह लिखता, जैसा सब लिख रहे हैं तो आप ही कहते कि सुबोध, तुममें नया क्या है जो तुम छपोगे। तुम जो लिख रहे हो, वैसा तो लोग पहले से लिख रहे हैं। तब तुम्हारे लिये जगह कौन बनायेगा। आज मैं अलग ढंग से लिखता हूँ, एक्सपेरीमेन्ट करता हूँ, तभी तो आप थोड़ी सी रूचि ले रहे हैं। आपको भी कुछ नया-नया सा लग रहा है। मैं भी सभी की तरह लिखता तो आप ही कहते, देखो फ़लाने की तरह लिखता है। मुझे किसी अलाने-फ़लाने की तरह नहीं लिखना है। मुझे अपनी तरह लिखना है। नये पाठकों के लिये लिखना है। मैं ये नहीं कहता कि मेरी कहानी में औरत का एंगल नहीं होगा। मैं ये भी नहीं कहता कि मेरी कहानी शोषित और सर्वहारे वर्ग पर नहीं होगी। बिल्कुल होगी। लेकिन मैं इसलिये नहीं लिखुँगा कि बाक़ी सब ऐसा ही लिख रहे हैं तो मुझे भी लिखना चाहिये बल्कि तभी लिखुँगा जब मेरे सामने ऐसा कुछ घटेगा जिसकी गवाही मेरा दिल और दिमाग़ दोनों देगा।’’
     ‘‘हम कहे थे न’’ मनोहर जी बीच में बोले और पुरुषोत्तम की ओर देख कर फिक्क से मुस्कुरा दिये। तभी मुरली बोला-
     ‘‘सुबोध जी, मुझे लगता है कि आपका व्यंग्य तो ठीक था लेकिन उसमें हास्य का पुट कम था। आप हास्य क्युँ नहीं लिखते हैं।’’
     पुरुषोत्तम बोला- ‘‘हास्य भी लिख सकता है लेकिन तब आप कहते की व्यंग्य क्युँ नहीं लिखते। हर लेखक को वही लिखना चाहिये जो वह लिखना चाहता है। पाठक क्या चाहता है यह सोच कर लिखा जा रहा है तभी तो हिन्दी साहित्य का स्तर बढ़ नहीं रहा है। साहित्य केवल मनोरंजन नहीं है। एक संस्कार है। शिक्षा का एक पूरक अंग है। शिक्षा के इस माध्यम को इतना भी लाचार नहीं बना देना चाहिये कि कुछ दिन बाद पाठक बैठ कर लिखवाने लगें। पाठक साहित्य की दशा पर चिन्ता कर सकते हैं लेकिन दिशा तय करना उनका काम नहीं है। अगर पाठक दिशा तय करने लगे तब हो चुका साहित्य का उद्धार। मैं मानता हूँ कि पाठक को मनोरंजन चाहिये, लेकिन साहित्य की अस्मिता और अस्तित्व के बदले तो क़तई नहीं।’’
     कुछ देर कमरे में चुप्पी छाई रही। सब ऐसे सर को झुका कर हल्के-हल्के हिला रहे थे मानों कुछ सोच रहे हों। दो लोग बात काटने के बारे में सोच रहे थे और दो लोग बात बनाने के बारे में सोच रहे थे। तभी मनोहर जी पुरुषोत्तम की ओर देखते हुये बोले -
     ‘‘अरे, वो पारस पत्रिका का सम्पादक आपके बारे में पूछ रहा था। उसके बाद कोई आर्टिकल दिये नहीं आप।’’
     तभी मुरली बोला -
     ‘‘हाँ, पुरुषोत्तम जी! आप का वो लेख लाजवाब था। आप रेग्यूलर काहे नहीं लिखते हैं। बहुत अच्छा लिखते हैं आप। परसो हमको जाना भी है उनसे मिलने। अगर कल शाम तक कोई आर्टिकल हो जाये तो हमको दे दीजियेगा। हम दे आयेंगे।’’
     पुरुषोत्तम, सुबोध को देख कर हल्के से मुस्कुरा दिया। कैसा खेल है? जिसके पास लिखने का समय नहीं है उससे आग्रह पर लेख माँगा जा रहा है- आर्टिकल आॅन डिमान्ड! और जो साहित्य के लिये सब कुछ क़ुर्बान कर चुका है उसकी छीछालेदर की जा रही है। पुरुषोत्तम, जिसके पास समय नहीं है और उनके हिसाब से सुबोध, जिसका साहित्य वर्तमान स्तर से दस-पन्द्रह साल आगे है, दोनों एक ही तीर में धाराशायी। एक लिखेगा नहीं और दूसरे को मौक़ा ही नहीं देना है। उसने कहा -
     अच्छा चाचा जी, ये आया था अपनी कहानी संग्रह के बारे में बात करने। ज़रा प्रकाशक को एक दिन बुलवाते।
     मनोहर जी मुरली की तरफ़ देखने लगे। मुरली बोला-
     ‘‘कुछ पैसा-वैसा तो लेंगे ही सुशील जी? हमको नहीं लगता है कि बिना पैसा लिये छापेंग।े’’
     मनोहर जी बोले- ‘‘हाँ, ऊ त लेवे करेगा। लेकिन इ देंगे कहाँ से।’’ फिर पुरुषोत्तम की ओर देख कर बोले- ‘‘है कि नहीं, बेरोज़गार आदमी पैसा कहाँ से देगा, आप ही बताईये।’’
     तभी मुरली हँसते हुये बोला -
     ‘‘अरे! वैसा वाला बेरोज़गार भी नहीं हैं सुबोध जी, एक किताब छपवाना इनके लिये बाँये हाथ का खेल है।’’
     तब मनोहर जी बोले-
     ‘‘अच्छा आप उसका नम्बर लीजीये। कल नौ से दस के बीच में फोन कीजियेगा। कहियेगा कि मनोहर जी नम्बर दिये हैं। बोले हैं कि छापा जा सकता है। आप चाहें तो अपने किसी आदमी से समीक्षा करवा लें और कह दीजियेगा कि हम पैसा नहीं दे सकते हैं।’’
     पुरुषोत्तम फिर सुबोध को देख कर मुस्कुराया। पिछली बार यही मनोहर जी थे जिन्होंने आश्वासन दिया था। यही मनोहर जी थे जिन्होंने कहा था कि प्रकाशक को घर पर बुला कर सुबोध से मिलवा देंगे। छापेगा कैसे नहीं। आज वही ढ़ाई घर कूद कर बोल रहे हैं। उस दिन वज़ीर बन कर बात कर रहे थे और प्रकाशक सुशील के संघर्ष के दिनों में दी गई अपनी मददों के बारे में बताते अघा नहीं रहे थे।
     सुबोध का मन छोटा हो गया। ऐसे रिकमेन्ड करने का क्या अर्थ होता है, वह अच्छे से देख चुका है। ऐसे लग्गी वाले रिकमेन्डेशन को वह पचासों बार जी चुका है। एक दर्जन बार अपमानित हो चुका है।
     उसके बाद साहित्य की दशा और दिशा पर चर्चा होने लगी। मनोहर जी बीच-बीच में अपनी कहानियों का हिस्सा सुनाते रहे। मुरली यथावत लीक से हट कर प्रश्न करता रहा। सुबोध भीतर से तप रहा था। कुछ ऐसा हुआ कि बातचीत का सिरा सुबोध के हाथ में आया और उसने कहना शुरू किया-
     ‘‘हज़ारों वर्ष पहले पृथ्वी पर नागों का शासन था। इसे एक लोक कथा समझिये। लेकिन वे दिन में बाहर नहीं निकलते थे। कारण थे पक्षी। पक्षियों की संख्या उनके जितनी तो नहीं थी लेकिन हवा में उड़ पाने के कारण वो नागों पर भारी पड़ते थे। तब नागों के राजा ने नागदेवता की तपस्या शुरू की। नाग देवता प्रकट हुये और बोले- बेटा, हम तुमलोगों की समस्या से अनजान नहीं हैं। हम जानते हैं कि दिन में तुमलोग पक्षियों के कारण बाहर नहीं निकलते हो और रात में अन्धेरा होने के कारण शिकार करने में कठिनाईयों का सामना करना पड़ता है। तुम्हारी उम्र अभी सनतानवे साल है। जिस दिन तुम सौ साल के हो जाओगे उस दिन तुम्हें स्वयं ही इसका समाधान मिल जाये। नागराज थोड़ा आश्वस्त हुआ कि चलो तीन साल बाद समस्या सुलझ जायेगी। जिस दिन नागराज सौ साल का हुआ उसी रात उसके सर पे एक मणि प्रगट हो गई। मणि में इतना प्रकाश था कि लगता था साक्षात चन्द्रमा उसके साथ चल रहे हैं। नागों के जीवन में बहार आ गई। रात का अन्धेरा उनके लिये कोई समस्या न रहा लेकिन दुर्भाग्यवश नागराज के मन में अहंकार समा गया। उसे लगा कि उसकी मणि के कारण ये सब जी खा रहे हैं वरना ये तो मर ही जाते। कुछ नये-नवेले नाग नई विचारधारा के थे। जीवन में नई पद्यति लाना चाहते थे। शिकार का नया तरीकीबों को आज़माना चाहते थे। गाहे बगाहे उनकी नागराज से बहस भी हो जाती थी। अहंकार के मद में चूर नागराज इस बात से और चिढ़ गया और एक शाम चुपचाप उसने मणि को सर से उतार कर अपने फन से ढँक दिया। साँपों को मणि की रोशनी में शिकार करने की आदत पड़ गई थी सो वे व्याकुल हो उठे। इस व्याकुलता के आलम में हज़ारों साल बीत गये। उधर नागराज मणि को अपनी ज़रूरत भर निकालता रहा और छुपाता रहा। उनकी दुनिया कमज़ोर होती गई लेकिन नागराज पर इसका कोई असर नहीं पड़ा। वह तो अपने पुराने तरीके से चलना चाहता था। मणि को वह अपने तरीके से इस्तेमाल करना चाहता था। अन्ततः उसकी दशा भी अन्य नागों की तरह ही हो गई लेकिन वह कुछ नहीं कर सका क्युँकि तब तक रात में शिकार करने वाले पक्षी अस्तित्व में आ गये थे।’’
     इतना बोल कर सुबोध ने पुरुषोत्तम, मनोहर जी और मुरली को बारी-बारी से देखा।
     मुरली से रहा न गया। बोला -
     ‘‘इस कहानी का अभिप्राय समझ में नहीं आ रहा है सुबोध जी और कहानी अधूरी भी लगती है।’’
     सुबोध सोफ़ा पर थोड़ा पीछे लद गया और बोला- ‘‘मुरली जी, कहानी अधूरी नहीं है, पूरी है। हमलोग अभी साहित्य की दिशा और दशा पर बात कर रहे थे। ये कहानी उसी संदर्भ में है। जो नागराज है वो पुराने साहित्यकार हैं। पास में मणि है लेकिन दूसरे को राह नहीं दिखायेंगे। उसका इस्तेमाल अपने पुराने और आउटडेटेड लेखनी के साधन में करेंगे और कहानी में जो विद्रोही नाग हैं, वो नये लेखक हैं। नये रास्तों पर चलना चाहते हैं। लेकिन प्रकाश के अभाव में न तो उन्हें कोई रास्ता मिल रहा है न ही कोई दरवाज़ा, जहाँ से वे साहित्य की प्रोफ़ेश्नल दुनिया में घुस सकें। पक्षियों के बारे में इतना कहुँगा कि वो इन्फोटेनमेंन्ट के अन्य साधन हैं जो साहित्य के काॅन्टेन्ट को निगल जा रहे हैं, क्युँकि उन्हें उड़ना आता है। अगर मैं वैसा साहित्य लिख पा रहा हूँ जो दस साल बाद लिखा जाना है तब तो मैं बाक़ी साहित्यकारों से आगे देख सकता हूँ, आगे सोच सकता हूँ। फिर मुझे मौका क्युँ नहीं मिल सकता। अगर मैं साहित्य के वर्तमान स्तर को दस साल आगे ले जाने की क्षमता रखता हूँ तो इसमें बुरा क्या है। लोग मेरे जैसे लेखकों की लेखनी से नहीं जुडे़गे या नहीं समझ पायेंगे ये पहले कैसे मान लिया जा रहा रहा है। इतना संदेह क्यूँ? पुरानी चीज़ों को ढ़ोते रहने का मोह क्यूँ? नये कोपलों की पत्तियाँ बनने से पहले ही इतनी निन्दा क्युँ? और तब भी आप साहित्य की दशा और दिशा पर व्याख्यान का आयोजन कर रहे हैं। इसकी तो कोई दिशा हो ही नहीं सकती। क्युँकि यह दुनिया अब विजनलेस होती जा रही है। दूरदृष्टि रखने वाले साहित्यकारों को दुरदुराया जा रहा है। चालीस साल से चली आ रही कहानियों को फ़ार्मेट बदल-बदल कर परोसा जा रहा है। कोई रेणु जैसा लिख के प्रसिद्ध हो रहा है और छापा जा रहा है तो कोई कृष्ण बलदेव वैद्य और भीष्म साहनी जैसा लिख कर धन्य हुआ जा रहा है। जहाँ आगे सोचने वालों की जगह ही नहीं हैं, उसकी दिशा की तो बात ही बेमानी है। आज दस करोड़ लोग फ़ेसबुक का इस्तेमाल कर रहे हैं। ढ़ाई करोड़ लोग ट्वीटर का इस्तेमाल कर रहे हैं। तब भी पुराना साहित्यकार स्टेटस अपडेट का मतलब नहीं समझता। आज हिन्दुस्तान में करोड़ों लोग ई-मेल का इस्तेमाल कर रहे हैं और आधे से ज़्यादा पुराने साहित्यकारों को ई-मेल सर्विस का इस्तेमाल करना नहीं आता। वास्तव में हैं वो पीछे लेकिन नये साहित्यकारों पर ज़रूरत से ज़्यादा आगे रहने का दोष मढ़ दे रहे हैं।’’
   पुरुषोत्तम उसका चेहरा देख कर मुस्कुरा रहा था। मनोहर जी को अच्छा नहीं लगा। मुरली सर झुकाये अपने पैरों को देख रहा था। तब पुरुषोत्तम ने कहा-
     ‘‘अच्छा चाचा जी, इसको एक जगह काम से जाना है। अब निकलते हैं हमलोग। आपका भी स्नान ध्यान का समय हो ही गया है। कल ये प्रकाशक से बात करेगा, फिर आप जैसा कहियेगा कर लेंगे।’’
     मनोहर तुरन्त जी उठ खडे़ हुये जैसे उनके जाने का ही इन्तज़ार कर रहे थे।
     दिन तो इधर-उधर की भागदौड़ में गुज़र गया। शाम में बच्चे बीबी ने वक़्त ले लिया। जब सब सो गये तब सुबोध लिखने बैठा। ग्यारह बज रहे थे। चार बजे कहानी पूरी हो गई। तभी बाबूजी पेशाब करने उठे। सुबोध के स्टडी रूम की जलती बत्ती देख झाँकने चले आये। सुबोध के हाथों में क़लम थी और वह कहानी का शीर्षक सोच रहा था। क्या शीर्षक अच्छा होगा इस कहानी का। ‘साँप की मणि’, नहीं... ‘अभागी कोपलें’ या फिर ‘पूर्वाग्रह’। कुछ भी नहीं जँच रहा था उसे। बाबूजी उसपर एक नज़र डाल कर बाथरूम चले गये। सुबोध काॅपी बन्द कर स्टडी रूम में लगे पलंग पर लेट कर सोने की कोशिश करने लगा। कब आँख लगी, मालूम नहीं।
     सुबह सभी छोटी बड़ी प्राकृतिक शंकाओं से निवृत होकर सुबोध डायनिंग टेबल पर आ बैठा। बाबूजी बगल में लगी चैंकी पर बैठ कर अख़बार पढ़ रहे थे। माँ नाश्ता निकालने लगी। बाबू जी ने पूछा- ‘‘कल मनोहर जी के यहाँ क्या हुआ?’’
     सुबोध ने पूरी घटना संक्षेप में सुना दी। बाबूजी ने अख़बार रख दिया और उसी तरह बाँये हाथ से ललाट को ढँककर आगे-पीछे डोलने लगे। कुहनी, मुडे़ हुये घुटने पर अड़ी थी। कुछ देर बाद बोले-
     ‘‘रात में चार बजे तक क्या कर रहे थे? इतना देर मत जगो बेटा। प्रथम सुख निरोगी काया। स्वास्थ्य से खिलवाड़ करना अच्छा नहीं है।’’ माँ नाश्ता ले आई। नाश्ता करने के बाद उसने प्रकाशक का नम्बर मिलाया। दो तीन पूरी घन्टी बजने के बाद भी उसने नहीं उठाया। दिन अभी कटना बाक़ी था। कुछ नया लिखने की इच्छा ही नहीं हो रही थी सो रात कटना भी बाक़ी था। अगले दिन उसने फिर फ़ोन किया लेकिन प्रकाशक ने नहीं उठाया। तब उसने एक मैसेज़ किया। आजकल टेलीमार्केटिंग करने वाले इतना फ़ोन करते है कि लोग अन्जान नम्बर नहीं उठाते, ख़ासकर व्यस्त लोग। चार दिन बीत गये। ना तो मैसेज़ का कोई जवाब आया और ना ही उसने काॅल बैक किया। चैथे दिन शाम में उसने पुरुषोत्तम को सारी बातें बता दी। पुरुषोत्तम क्या बोलता। उसने ढ़ाढ़स सा दिया और कहा-
     ‘‘कुछ लिखे इधर?’’ सुबोध ने कहा- ‘‘एक कहानी लिखे हैं , मनोहर जी से मिल के आने के बाद।’’
     ‘‘क्या टाईटल रखे हो ?’’ पुरुषोत्तम ने पूछा।
     ‘‘बहुत गन्दा टाईटल रखे हैं।’’- सुबोध ने मुस्कुराते हुये कहा।
     पुरुषोत्तम हँसने लगा और बोला- ‘‘अच्छा! क्या रखे हो, बता दो?
     सुबोध ने हँस कर कहा- ‘‘मुझ से तो रन्डी भली!’’

"निर्मल अगस्त्य Nirmal Augastaya"
(संगीतकार एवं स्वतंत्र लेखक।)
प्लॉट न. B/6, मित्र मंडल कॉलोनी
साकेत विहार, अनिसाबाद 
पटना, बिहार - 800002 
दूरभाष - 9308485825 
ई-मेल - nirmalaugastaya@gmail.com

Friday, August 12, 2016

"वो दुनियाँ अगर "


वो दुनियाँ...
विश्लेषन की कैंची से परे 
तर्क के सैंड पेपर से 
दूर हम खडे़ 
जो था बस कल्पना थी...
मन था... सपने थे...
जहाँ परियाँ थी झूलों पर
बोतल में बन्द जिन्न था 
भूत, पिशाच, अमावस की रात में 
रोटी-प्याज़ माँगने वाली बुढ़िया
और झाड़ू पर उड़ने वाली चुड़ैलैं थी,
बचपन  की वो दुनियाँ 
जो पीछे छूट गयी 
कहानियों वाली दुनियाँ 
कॉमिक्सों वाली दुनियाँ 
रेडियो, अख़बारों वाली दुनियाँ। 

वो गुड्डे-गुड़ियों की शादी की दुनियाँ 
वो परियों की कहानियों की दुनियाँ,
वो शरबत की दुनियाँ 
जिसके लिये नीम्बू 
बड़ी बहादुरी से चुराये थे हमने,
वो पहली-पहली बार पिकनिक की दुनियाँ 
जिसके लिये चूल्हे जलाये थे हमने। 

वो पूड़ी जो कच्ची भी-पक्की भी प्यारी थी 
वो सब्ज़ी जो हम मिनटों में चट कर जाते थे 
फ़िर बर्तनों से टन-टन लड़ाई की दुनियाँ 
वो मीठे मोहब्बत के झगड़ों की दुनियाँ 
वो काग़ज़ी बन्दूकों से ढिचक्यों का खेला 
वो दुर्गाबाड़ी में चैतीदुर्गा का मेला 
उस मेले में संवरकी के बेर की चटनी 
खिचड़ी के परसाद के लाईन का रेला।

वो पानी की कमसिन मूँछों की दुनियाँ 
वो मूँछों में सनसनाती पानी की दुनियाँ 
वो दुनियाँ तुम्हारी थी वो दुनियाँ  थी मेरी 
कहाँ छोड़ आये चकल्लस की दुनियाँ। 

निर्मल अगस्त्य। 
(कविता संग्रह "इसी कुछ में" से।)

Wednesday, July 13, 2016

"हम ही थे"



हम सभी थे,
लगे-भिड़े 
व्यस्तता घुटनों तक मोड़े। 

परियों की कहानियों की किताबें, 
छतरियों की टूटी कमानियाँ 
दैनिक ख़र्च की डायरी 
अख़बारों के ढ़ेर 
और अपने ही आकार में 
पुराने पर गये 
जूतों के आस-पास। 

हम सभी थे, 
बोलते-बतियाते 
छाँटते-छूँटते। 

कुर्ते, 
जो उदासी ओढ़ चुके थे 
कुछ गुल्लक 
जिनमें अब 
खनक का संगीत नही था, 
कूँये की चरखी 
ज़ंग पहनती बाल्टी 
रस से बेज़ार कुछ रस्सियाँ। 

हम सभी थे, 
जुते-पुते 
समेटते-उठाते। 

तस्वीरें 
जो कभी बोलती थीं,
कूचियाँ 
जिनमें रंग अभी भी पसरे थे, 
गंडे और धागे  
जिसमें कभी मन्त्रों का बसेरा था। 

हम सभी थे, 
पोछते-पाछते 
धोते-सुखाते। 

छिपा के रखी गई कवितायें 
भटकाव के साक्षी टिन के बक्से 
अप्रकाशित पान्डुलिपियों की फ़ाईलें 
पत्रों के बन्डल, 

हम सभी थे, 
चुनते-चुनवाते 
बेचते-बाचते। 

इसके उपरान्त घर पुनः 
सिली हुई कमीज़ की तरह 
लगने लगा था 

और हम सभी थे 
बटनों की तरह सिले-कढ़े 
अपने-अपने हिस्से की खोहों में 
बीतते-समाते 
धागे से बोलते-बतियाते 
जुड़ते-जुड़ाते 

हम ही थे, 
वापस से अवशेष 
बोते-उगाते।
  
"निर्मल अगस्त्य"
13-07-2016
पटना, बिहार 

Wednesday, June 1, 2016

"ज़िन्दगी का फ़ोटो-स्टेट"

हर दिन सुबह-सुबह 
मुट्ठी में धूप पकड़ कर 
हम निकलते हैं 
ठीक कल बीती ज़िन्दगी का 
फ़ोटो-स्टेट कराने। 

कहीं क़तार लम्बी होती है 
कहीं बिजली नहीं होती, 
कहीं मशीन ख़राब होती है 
तो कहीं ऑपरेटर 
खाना खाने गया होता है। 

बाज़ार की गन्दगी से कभी-कभी 
हम किसी गली में जा ही नहीं पाते हैं 
जहाँ सम्भव था 
ये समस्यायें नहीं होतीं। 

हम ढ़ूँढ़ते हैं 
साफ़ सुथरी सड़क के किनारे 
कोई साफ़ सुथरी दुकान,
आख़िर सवाल है 
ज़िन्दगी के फ़ोटो-स्टेट का 
जो ठीक कल के कल बीती है। 

लिट्टटी खाते... चाय पीते....
बच्चों की किताबें ख़रीदते.....
साग-भाजी का भाव पूछते... 
फिसलती धूप को 
मुट्ठी में पकड़े-पकडे़ 
घर वापस आने लगते हैं 
और जब धूप 
पूरी तरह मुट्ठठी से फिसल जाती है, 
कल की ज़िन्दगी के 
फ़ोटो-स्टेट की ज़रूरत ही नहीं रहती 
जब आज के दिन की ज़िन्दगी की रचना 
देहरी तक पहुँचते-पहुँचते 
मूल पाण्डुलिपि में प्रस्तुत हो जाती है।

निर्मल अगस्त्य। 

कविता संग्रह "इसी कुछ में" से 

Monday, May 9, 2016

"हम जैसों का मरना कोई मरना नहीं होता"

तुम्हारे घर के लोगों ने 
तुम्हारा नाम आदित्य रखा 
क्या सोच कर? 
इतना तो जानते ही होंगे कि 
आदित्य का मतलब सूरज होता है 
लेकिन ये नहीं जान पाये 
कि सूरज हम जैसों का नहीं होता। 


सूरज होता है रक्तपिशाचों का 
भड़वों का, रंडियों का, दलालों का, 
सूरज होता है उनका 
जिनके लिए सब कुछ 
बस उनका होना होता है। 


हज़ारों सालों से यही होता आया है 
मेरे भाई आदित्य 
सूरज हम जैसों के लिए नहीं बनाया गया। 
तुम तो शरीर से मुक्त हो गए 
लेकिन तुम्हारे जैसे कई हैं 
जो इस शरीर के भीतर 
हर रोज़ किसी सूरज की रोशनी के 
ठेकेदार के हाथों 
मर-मर के जीते जा रहे हैं, 
और वैसे भी -
हम जैसों का मरना 
कोई मरना नहीं होता 
ये बस आंकड़ों में 
एक इज़ाफ़े की लरज़िश भर होता है।   


02:42 AM, 10-05-2016
निर्मल अगस्त्य  

Saturday, April 16, 2016

ग़ज़ल_ख़्वाहिशों के चराग़ों ने

ख़्वाहिशों  के  चराग़ों   ने, मोहब्बत ही जला डाला 
बेआरज़ू  ही   अच्छे   थे,   मतलब   ने  रुला डाला

नामाबर ही  सच्चा था,    ,हर रोज़   मिला तुझको 
उसके    पढ़ने     ने,     ,हर्फ़ों    को    हँसा    डाला 

इमाक़त नहीं मुमकिन, है अक़ीदत की ये फ़ितरत  
इबादत  का भ्रम रख,  ख़ुदा   को  ही   भुला  डाला

इतनी  कुर्बत  थी   कि  बसारत   से इत्मीनान रहे 
ख़ामख़ा  के   इल्लाह    ने   सरासर   ज़हर   डाला

इस्तिजारत    की   ज़रुरत   कभी   थी   ही   नहीं 
अब   चलते   हैं,  कह   के     बेगाना  बना   डाला 

12:39 AM, 17-04-2016
पटना   

Saturday, February 20, 2016

"साऊन्डस्केप"


ठन्न... ठन्न...ठन्नाक्क...!
ठुन... ठुनुन... टनन... टनन... ठुन्न...! 
छन्न...! 
ऐ! तू क्या ढ़ूँढ़ता है इस आवाज़ में ? 
खुरपी-बगीचा, कुदाल-खेत 
गंडासा-कुट्टी, हंसुली, चने का साग 
लुहारिन का सरिया, बबुआ का बुशर्ट ।

चर्र... चुंई... चंक्क...! 
च्येंक्क... चरर... मरर...! 
चंक्क...कचंक्क...! 
ऐ तू क्या ढ़ूँढ़ता है इस आवाज़ में ? 
हीरा-मोती के लिये नई घन्टी 
बीज... खाद...मेला... 
हवा मिठाई, देसी मिट्ठा ।

तुन्न... तन्नाक...!
तन्नक, ट्वेंक्क... तुन्न, ट्वेंक्क...! 
तनक-तनक, तुन-तुन!
ऐ तू क्या ढ़ूँढ़ता है इस आवाज़ में ? 
पूस का भोर, सिम्मर का गाछ 
उड़ती हुई बर्फ़, सुई-धागा-सिलाई 
बचिया की कुरती, बाबुजी की बन्डी ।

छई... छप्पाक... छप्प... छप्पाक...! 
छपा-छप्प... छपा-छप्प...! 
हई... हच्चाक...! 
ऐ तू क्या ढ़ूँढ़ता है इस आवाज़ में ? 
रेहू-गरई, सीप में मोतिया 
शंख-शालिग्राम, मूँगे की डिबिया 
शकुन्तला की किस्मत, मछुआरिन का नकबुल्ला ।

हई... हईया... ज़ोर लगा के हईया... 
दम लगा के हईया... 
ऐ तू क्या ढ़ूँढ़ता है इस आवाज़ में ? 
बाँस, बल्ला, पटरी 
आरा, चक्की, बोरा, लदान 
इँट, गारा, उठान,
एक सांझ का, खाना दो सांझ की दवाई 
सेठ का कर्जा, डाॅक्टर की परची 
कुंजरिन का उधार, स्कूल की अर्ज़ी।
पानी का टैक्स, रोड का टैक्स 
हवा का टैक्स, जिनगी का टैक्स 
अकाश का टैक्स, मसान का टैक्स, 

सस्ते गल्ले का गेहूँ 
लाल किले का ओझा 
विदवानों के देस में ठप्पे का बोझा 
लहसुन चुड़ैल बने, प्याज बने डाईन 
बीस सीट की बहाली 
बीस हजार की लाइन ।

हईट... हुश्त... हुर्र... खटाक्क... 
खट... चटाक्क... धाँय... धड़ाम्म... 
तड़...तड़... तड़ाक्क... 
ढि़चक्यों... ढ़ूंम्म... 
ऐ तू क्या ढ़ूँढ़ता है इस आवाज़ में ? 
ए बोल ना... तू क्या ढ़ूँढ़ता है इस आवाज़ में? 
ए बोल ना, बोलता क्यूँ नहीं
अरे कोई तो बोलो... 
भगवान के लिये तो बोलो भाई... 
अल्लाह के लिये तो बोलो... 
जीसस के लिये तो... 
नानक के लिये... 
बुद्ध के... 
महावीर...

निर्मल अगस्त्य 
02:05 PM, 20-02-2016
पटना।                                  
  


Wednesday, January 20, 2016

"शब्दों के होने से"


एक अकेला दिल 
कुछ पन्ने 
और शब्दों के साये! 

पिछले पन्ने का शेष 
पता नहीं कहाँ से 
आकस्मिक दुःख की तरह 
इस पन्ने में भी चला आता है? 

एक अकेला शरीर 
कुछ रिश्ते 
और शब्दों के साये! 
जबकि, 
मुझे अच्छी तरह याद है 
इस शेष को 
पिछले पन्ने में 
बक़ायदा निबटा दिया था मैंने। 

एक अकेली ज़िन्दगी 
कुछ सुख 
और शब्दों के साये! 

दुःख निबटता नहीं, 
आकस्मिक दुःख तो 
और भी नहीं निबटता। 
जैसे ख़त का 
लौटा दिया जाना, 
जूतों के फ़ीते 
ग़ुम हो जाना, 
कमीज़ के किसी बटन का 
ऊपर या नीचे वाले 
छेद में लग जाना, 
पक्की रात में 
ग्लास गिरने की आवाज़ से 
आती हुई नींद का सहम जाना। 


एक अकेली रात 
थोड़ी सी नींद, 
अस्वीकृत हस्तक्षेप 
और पिछले पन्ने का शेष! 
साथ-साथ आकस्मिक दुःख 
तो है ही है 
ज़िन्दगी के हिसाब-किताब में 
उलझने के लिये, 
और शब्दों के साये हैं! 
    
निर्मल अगस्त्य 
03:08 AM, 21-01-2016
पटना 


Sunday, January 3, 2016

"मेरी उम्र एक दीवार है"


आओ...
तुम भी लिखो,
मेरी उम्र की दीवार पर।


मेरी उम्र
जो गुज़रती गई दर-बदर,
कैसे बयां हो?
कि बस एक दीवार है
जिसपे पहली बार
कुछ बीस बरस पहले
लिखा था किसी ने-
‘‘मुझे तुमसे प्यार है!’’


वे तहरीर, वो लिखावट
और वही दीवार,
दर-बदर!
ये कैसे बयां हो।


यूँ ही साल दर साल
लिखते रहे लोग
मेरी उम्र की दीवार पर,
अपना नाम 
और मेरा नाम,
कुछ दिल सी आकृति के घेरों में,
जो टूटे 
तो टूटे बस उनके लिये। 


नाम मेरा रहा
उसी दिल सी आकृति के घेरों में
ख़ामोश!
जैसे मेरे उम्र की दीवार
रह गई ख़ामोश
दर-बदर गुज़रती हुई।


सब उसी यक़ीन से
निशानी छोड़ आये
कि जैसे लिखावट और वादे
एक ही चीज़ हो,
बस मेरी उम्र जानती है
और उम्र की दीवार
कि बस लिखावट 
रह गई है बाकी,
अब वादे कैसे बयां हो।


तुम ख़ुद को देखो
तो तुम
नई-नई आई हो,
मैं ख़ुद को देखूँ
तो तुम नई नहीं आई हो
जो इतनी संजीदा हो
और दूर-दूर, सहमी-सहमी सी
जैसे बारिश में भींगती।
एक बार तो लिख कर देखो-
अपना नाम, फिर मेरा नाम
दिल सी आकृति के घेरों में।


दीवारों से क्या रिश्ता
उम्र से क्या नाता,
और ऐसे भी बीतती है
तो बीतने दो,
ये मेरी उम्र है!
तुम बस लिखो
कि दो कदम पे तक़ल्लुफ़ है
और दो हाथ पे स्याही।
मेरी उम्र की दीवार पर
तुम भी...
तुम भी अपना नाम लिखो,
और वादे?
वादे तो भूल जाने के
मुकम्मल सामां हैं।


दिल सी आकृति के घेरों में
एक इबादत तुम भी लिखो
मेरी उम्र की दीवार पर,
तुम भी लिखो
बस उसी यक़ीन से,
तुम भी लिखो
बस उसी शिद्दत से,
तुम भी निशानी छोड़ दो 
कि तहरीर और अहद
एक ही तो चीज़ है।
घेरों की परवाह
तुम्हें क्यूँ कर हो,
वैसे भी अब तक उन घेरों में
उन दिल सी आकृति के घेरों में
बस मेरा नाम ही बाकी है,
मेरी उम्र की दीवार
गुज़रती आ रही है जो
दर-बदर!
ये कैसे बयां हो?

निर्मल अगस्त्य
07:05 PM, 03-01-2016
पटना