Tuesday, February 24, 2015

"एक ठहरा हुआ ख़त जो भेज न सका"

"एक ठहरा हुआ ख़त जो भेज न सका"


जीने का हुनर तुम रख लो
चाहने की इजाज़त मुझे दे दो,
पाने की तमन्ना तेरा हक़ है 
खोने का हक़ तो मुझे दे दो। 


ऐसे भी हम बन्द गली के 
अन्धे कोने में बसते हैं,
जी चाहे तेरे नूर से चमकें 
लेकिन कहने से डरते हैं 
कुछ भी आखिरी नहीं दुनिया में 
आखिरी सदा का हक़ तो मुझे दे दो,
जीने का हुनर तुम रख लो
चाहने की इजाज़त मुझे दे दो। 


छोड़ सकूँ ये कब होता है 
मेरी साँसें तुझसे जुड़ती हैं,
किस पगडंडी को कोसूं मैं 
हर राह तेरे कूचे मुड़ती है 
टुकड़े कर दो तो भी इनायत 
जुड़ने का हक़ तो मुझे दे दो,
जीने का हुनर तुम रख लो
चाहने की इजाज़त मुझे दे दो,
पाने की तमन्ना तेरा हक़ है 
खोने का हक़ तो मुझे दे दो। 


(निर्मल अगस्त्य)

Wednesday, February 18, 2015

"हम सभी बाट जोहते हैं"

"हम सभी बाट जोहते हैं"

चाँद, सितारे, आकाश, धरती... 
अनुरोध, क्रोध, वेदना और सौंदर्य! 
सभी बाट ही तो जोहते हैं। 
प्रशन्सा की, मुक्ति की, 
आयामों की और एक हाँ भर की! 
जीवन, मृत्यु, संघर्ष, आक्षेप.... सभी। 
परछाई, प्रारब्ध, शब्द... 
कवितायें और उनके अर्थ! 
बाट जोहते हैं 
अपने अस्तित्व के मुकम्मल होने की। 

कुछ होने और कुछ नहीं होने के अन्तराल में 
सारी सारी सृष्टि बाट जोहती है। 
प्रेम, दर्शन, प्रार्थना ओर प्रश्न, 
स्वीकृति की बाट जोहते हैं। 
इसमें नया कुछ भी नहीं है! 
बाट जोहना तो 
विधना का एक मौलिक सूत्र है 
जिसमें विधाता भी बन्धा है। 

कोई विशेष उपक्रम आवश्यक नहीं है 
इस बात पर कि मेरे होने 
और मेरे नहीं होने का जो अन्तराल है 
वह तुम भी हो सकते हो, 
एक सपना भी हो सकता है, 
पिछले जन्म के अनुराग से अनुबन्धित 
कोई आकृति भी हो सकती है! 
एक यक़ीन, एक अनय, एक प्रायश्चित 
या एक संकोच! 

मैं और मेरी कविता... 
उस संकोच के टूटने की बाट जोहते हैं।

(निर्मल अगस्त्य)

   

"हर पल नया है"

"हर पल नया है"

ये पत्तों को भी
सरसराने का अधिकार है,
नये अक्षरों को भी
शब्द बनाने का हक़ है।
हक़ है नये शब्दों का
कि वे भी सुने जायें और छपें,
नये हस्ताक्षरों कों भी
चमकने का हक़ है।
ये दुनिया हर पल नई है
हर अगली सांस नई है
हर अगली सुबह नई है,
सहेजना अच्छी बात है
और ज़रूरी  भी
लेकिन सहेजने के क्रम में
इतनी जगह तो
ज़रूर बनाई जा सकती है
जिसमें आ पायें
नये पत्ते, नये चेहरे
नये ख़्वाब, नई पहल
नये शब्द और नई कलम।

"निर्मल अगस्त्य"