Wednesday, December 30, 2015

"अभी हूँ!"


यह बस आज़ादी देने वाला जैसा ही था,
गरमा-गरम चाय की प्याली के साथ
घास पर लेट कर उपन्यास पढ़ने जैसा!
वह यूँ ही मुस्कुराता जब दोस्त पूछते- क्या हुआ?
वो उनसे कहता कि मैं हूँ अभी और बस ख़ुश हूँ!
बस्स...! उतना ही, जितनी चीनी की ज़रुरत है
बिना दूध वाली एक कप चाय के लिये
और आनन्द ले रहा हूँ छोटी-छोटी चीज़ों का,
जिन्हें शब्दकोषों में बहुत धीरे-धीरे सम्भाल कर
खरोंचों से बचा-बचा कर रखा जाता है।


मैं बस अच्छा हूँ, बस्स... अच्छा!
एक चम्मच चायपत्ती जितना,
न कम... न ज़्यादा!
और घास पर लेट कर
एक अच्छा सा उपन्यास पढ़ना चाहता हूँ, ठहर-ठहर कर!
शब्दों की तरह सुन्दर दिखना चाहता हूँ,
विरामों के साथ बढ़ते हुये और चाय पीते हुये।


और क्या?
आगे?
वह कहता है- मज़े में हूँ,
बस थोड़ा छुप-छुपा कर आया हूँ
और बस उतना ही जितनी हरियाली इन घासों में
और नीलापन आसमान में दिख रहा है।
आगे तो कुछ नहीं!
ज़रा जाने से पहले चाय पीना चाहता हूँ
और उपन्यास को अपने मन मुताबिक अन्तराल में पढ़ना चाहता हूँ,
अक्षरों की तरह टप्प... से बिखरना चाहता हूँ!
और वैसे भी यहाँ पहले से बढि़या है,
सामने उस पेड़ पर अभी-अभी एक चिड़ियां 
मुँह में तिनका लेकर दसवीं या शायद बारहवीं बार लौटी है।


यहाँ कम से कम मेरे उपर गिर पड़ने के लिये
आसमान के अलावा कुछ ख़ास है भी नहीं।
चमकती धूप तो है लेकिन हमेशा की तरह
उसे आज भी किसी से मिलने जाना है
और बारिश जो होते-होते रह गयी है,
वहाँ... उस तालाब में अपना अक्स देखने में
नर्गिस की तरह घन्टों से खोई है।

ठीक है.... फिर कल?
वह चाय की प्याली उठाता है और कहता है
कि कल के बारे में कुछ तय नहीं
और आज तो मैं बस यहीं हूँ,
धीरे-धीरे मद्धिम होता हुआ,
शिथिल होता हुआ!
चाय पीने के लिये,
घास पर लेटने के लिये,
बेहद वाली ज़िन्दगी से छुप-छुपा कर
छोटी-छोटी हदों वाली ज़िन्दगी के बेहद पास,
भर साँस उजास में!
भागम-भाग से अवकाश में!
  

"निर्मल अगस्त्य" 
02:32 AM
31-12-2015
पटना 

Tuesday, December 29, 2015

"विदा के वक़्त"


इससे क्या फ़र्क पड़ता 
अगर दूर जाते वक़्त हम 
हाथ हिला ही देते? 

शायद...! 
यह एक ब्रह्माण्ड जैसा शब्द है। 
शायद कह कर 
बहुत गहरे तक निश्चिन्त हुआ जा सकता है,
शायद कह कर  
सम्पूर्ण सृष्टि को 
हाथ हिलाने की तरह मान ले सकते थे हम। 
लेकिन ओझल हो सकने वाला दूर ना सही, 
दूर वाला दूर तो जा ही चुका था मैं!
और पहले जैसा होता रहा था,
तुम्हारे और मेरे बीच में 
कुछ और भी तो आ सकता था। 
जैसे परिन्दे, खेलता हुआ बच्चा, 
पेड़ से विलग कर नीचे गिर रहा कोई पत्ता। 


विदा जीवन की सुन्दरतम कविता है! 
नीरद, निर्मल, निर्लेप! 
बहुत चुने हुये लम्हों में से 
चुने हुये पलों को 
विदा के सम्मान के लिये चुना जाता है, 
इन्हें प्रलय के 
प्रग्लभ सौंदर्य की तरह 
बीतते देखने में आनन्द है, 
इसी के बाद नई शुरूआत है। 


तुम्हारी डबडबाई आँखों और 
मेरी मुस्कुराहट के बीच 
परिन्दा, खेलता हुआ बच्चा, 
पेड़ से विलग कर नीचे गिरता पत्ता 
और ब्रह्माण्ड सा शायद 
तो पहले से था, विहंगम! 
और कोई ज़रूरी तो नहीं था 
कि जिधर मैं बढ़ रहा था 
उधर कोई और 
पहले गया भी हो। 


तो रहने दो...! 
ये हम दोनों ने 
ऐसे भी तो एक साथ ही कहा था। 
चुने हुये लम्हों में से 
चुने हुये पलों की तरह, 
विदा के सम्मान के लिये खड़े 
हम भी तो शायद जैसा अलग-अलग 
कितने अच्छे दिखे थे, अपरक्राम्य! 


अलग-अलग ब्रह्मांड होना 
अजनबी हो जाने से सदैव अच्छा होता है। 
क्या फ़र्क पड़ता अगर दूर जाते वक़्त हम 
हाथ हिला ही देते?
    

निर्मल अगस्त्य। 
30-12-2015
2:02 AM
पटना 















Thursday, December 10, 2015

"हम ही थे।"


हम सभी थे,
लगे-भिड़े 
व्यस्तता घुटनों तक मोड़े। 

परियों की कहानियों की किताबें, 
छतरियों की टूटी कमानियाँ 
दैनिक ख़र्च की डायरी 
अख़बारों के ढ़ेर 
और अपने ही आकार में 
पुराने पर गये 
जूतों के आस-पास। 

हम सभी थे, 
बोलते-बतियाते 
छाँटते-छूँटते। 

कुर्ते, 
जो उदासी ओढ़ चुके थे 
कुछ गुल्लक 
जिनमें अब 
खनक का संगीत नही था, 
कूँये की चरखी 
ज़ंग पहनती बाल्टी 
रस से बेज़ार कुछ रस्सियाँ। 

हम सभी थे, 
जुते-पुते 
समेटते-उठाते। 

तस्वीरें 
जो कभी बोलती थीं,
कूचियाँ 
जिनमें रंग अभी भी पसरे थे, 
गंडे और तावीज़  
जिसमें कभी  मन्त्रों का बसेरा था। 

हम सभी थे, 
पोछते-पाछते 
धोते-सुखाते। 

छिपा के रखी गई कवितायें 
भटकाव के साक्षी टिन के बक्से 
अप्रकाशित पान्डुलिपियों की फ़ाईलें 
पत्रों के बन्डल, 

हम सभी थे, 
चुनते-चुनवाते 
बेचते-बाचते। 

इसके उपरान्त घर पुनः 
सिली हुई कमीज़ की तरह 
लगने लगा था 

और हम सभी थे 
बटनों की तरह सिले-कढ़े 
अपने-अपने हिस्से की खोहों में 
बीतते-समाते 
धागे से बोलते-बतियाते 
जुड़ते-जुड़ाते 

हम ही थे, 
वापस से अवशेष 
बोते-उगाते।
  
निर्मल अगस्त्य। 
12:57 AM
11-12-2015
पटना 

Sunday, December 6, 2015

इति...!

इति

ये एक 
बहुत लम्बे सिलसिले का 
छोटा सा वाक़या है। 
कमरे में आलमारी है 
आलमारी में दराज़े हैं 
और दराज़ों में 
हाशियों से भागी 
कुछ कवितायें हैं 
जिनके हर्फों में उलझने के बाद 
किसी और ग़म में उलझने के लिये 
लिखे गये कुछ फ़लसफे हैं 
जिन्हे परोस रहा हूँ 
कुनबे से भगा दिये गये 
कुछ अक्षरों से बने दोनों में 
बाग़ी स्याही की चटनी के साथ,
मैं कुछ ख़ास मेज़बानी नहीं जानता 
लेकिन उम्मीद करता हूँ 
कि तुम मेहमान ख़ास निकलोगे...।

निर्मल अगस्त्य 
कविता संग्रह "इसी कुछ में" से।