Tuesday, December 29, 2015

"विदा के वक़्त"


इससे क्या फ़र्क पड़ता 
अगर दूर जाते वक़्त हम 
हाथ हिला ही देते? 

शायद...! 
यह एक ब्रह्माण्ड जैसा शब्द है। 
शायद कह कर 
बहुत गहरे तक निश्चिन्त हुआ जा सकता है,
शायद कह कर  
सम्पूर्ण सृष्टि को 
हाथ हिलाने की तरह मान ले सकते थे हम। 
लेकिन ओझल हो सकने वाला दूर ना सही, 
दूर वाला दूर तो जा ही चुका था मैं!
और पहले जैसा होता रहा था,
तुम्हारे और मेरे बीच में 
कुछ और भी तो आ सकता था। 
जैसे परिन्दे, खेलता हुआ बच्चा, 
पेड़ से विलग कर नीचे गिर रहा कोई पत्ता। 


विदा जीवन की सुन्दरतम कविता है! 
नीरद, निर्मल, निर्लेप! 
बहुत चुने हुये लम्हों में से 
चुने हुये पलों को 
विदा के सम्मान के लिये चुना जाता है, 
इन्हें प्रलय के 
प्रग्लभ सौंदर्य की तरह 
बीतते देखने में आनन्द है, 
इसी के बाद नई शुरूआत है। 


तुम्हारी डबडबाई आँखों और 
मेरी मुस्कुराहट के बीच 
परिन्दा, खेलता हुआ बच्चा, 
पेड़ से विलग कर नीचे गिरता पत्ता 
और ब्रह्माण्ड सा शायद 
तो पहले से था, विहंगम! 
और कोई ज़रूरी तो नहीं था 
कि जिधर मैं बढ़ रहा था 
उधर कोई और 
पहले गया भी हो। 


तो रहने दो...! 
ये हम दोनों ने 
ऐसे भी तो एक साथ ही कहा था। 
चुने हुये लम्हों में से 
चुने हुये पलों की तरह, 
विदा के सम्मान के लिये खड़े 
हम भी तो शायद जैसा अलग-अलग 
कितने अच्छे दिखे थे, अपरक्राम्य! 


अलग-अलग ब्रह्मांड होना 
अजनबी हो जाने से सदैव अच्छा होता है। 
क्या फ़र्क पड़ता अगर दूर जाते वक़्त हम 
हाथ हिला ही देते?
    

निर्मल अगस्त्य। 
30-12-2015
2:02 AM
पटना 















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