हम सभी थे,
लगे-भिड़े
व्यस्तता घुटनों तक मोड़े।
परियों की कहानियों की किताबें,
छतरियों की टूटी कमानियाँ
दैनिक ख़र्च की डायरी
अख़बारों के ढ़ेर
और अपने ही आकार में
पुराने पर गये
जूतों के आस-पास।
हम सभी थे,
बोलते-बतियाते
छाँटते-छूँटते।
कुर्ते,
जो उदासी ओढ़ चुके थे
कुछ गुल्लक
जिनमें अब
खनक का संगीत नही था,
कूँये की चरखी
ज़ंग पहनती बाल्टी
रस से बेज़ार कुछ रस्सियाँ।
हम सभी थे,
जुते-पुते
समेटते-उठाते।
तस्वीरें
जो कभी बोलती थीं,
कूचियाँ
जिनमें रंग अभी भी पसरे थे,
गंडे और तावीज़
जिसमें कभी मन्त्रों का बसेरा था।
हम सभी थे,
पोछते-पाछते
धोते-सुखाते।
छिपा के रखी गई कवितायें
भटकाव के साक्षी टिन के बक्से
अप्रकाशित पान्डुलिपियों की फ़ाईलें
पत्रों के बन्डल,
हम सभी थे,
चुनते-चुनवाते
बेचते-बाचते।
इसके उपरान्त घर पुनः
सिली हुई कमीज़ की तरह
लगने लगा था
और हम सभी थे
बटनों की तरह सिले-कढ़े
अपने-अपने हिस्से की खोहों में
बीतते-समाते
धागे से बोलते-बतियाते
जुड़ते-जुड़ाते
हम ही थे,
वापस से अवशेष
बोते-उगाते।
निर्मल अगस्त्य।
12:57 AM
11-12-2015
पटना
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