इति
ये एक
बहुत लम्बे सिलसिले का
छोटा सा वाक़या है।
कमरे में आलमारी है
आलमारी में दराज़े हैं
और दराज़ों में
हाशियों से भागी
कुछ कवितायें हैं
जिनके हर्फों में उलझने के बाद
किसी और ग़म में उलझने के लिये
लिखे गये कुछ फ़लसफे हैं
जिन्हे परोस रहा हूँ
कुनबे से भगा दिये गये
कुछ अक्षरों से बने दोनों में
बाग़ी स्याही की चटनी के साथ,
मैं कुछ ख़ास मेज़बानी नहीं जानता
लेकिन उम्मीद करता हूँ
कि तुम मेहमान ख़ास निकलोगे...।
निर्मल अगस्त्य
कविता संग्रह "इसी कुछ में" से।
ये एक
बहुत लम्बे सिलसिले का
छोटा सा वाक़या है।
कमरे में आलमारी है
आलमारी में दराज़े हैं
और दराज़ों में
हाशियों से भागी
कुछ कवितायें हैं
जिनके हर्फों में उलझने के बाद
किसी और ग़म में उलझने के लिये
लिखे गये कुछ फ़लसफे हैं
जिन्हे परोस रहा हूँ
कुनबे से भगा दिये गये
कुछ अक्षरों से बने दोनों में
बाग़ी स्याही की चटनी के साथ,
मैं कुछ ख़ास मेज़बानी नहीं जानता
लेकिन उम्मीद करता हूँ
कि तुम मेहमान ख़ास निकलोगे...।
निर्मल अगस्त्य
कविता संग्रह "इसी कुछ में" से।
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