Sunday, March 8, 2015

"शरत चटर्जी रोड के फ्लैट में लिखी एक कविता !"

"शरत चटर्जी रोड के फ्लैट में लिखी एक कविता !"
----------------------------------------------------------
                       

               (1)
फूटपाथ पर दिखा एक सांवला सा युवक 
दमदम मेट्रो स्टेशन से बाहर 
जो घिरा हुआ था,
खुले, अधखुले 
छोटे-छोटे कपड़ों की थैलियों से,
उनमें से झाँक रहे थे- "बीज" !
तरह-तरह के बीज ! 
कद्दू, करेला, सीम, कुम्हड़ा, खीरा
लाल साग, डांटा साग, 
बीन्स और न जाने क्या-क्या। 
काले बादल आकाश से 
बरसने को व्याकुल
चौमासे के दूसरे महीने में 
और व्याकुल लग रहे थे कि 
कोई ले जाए हमें भी 
इस श्रावण मास में,
और अपने बीज होने के 
दायित्व के निर्वाह करने का मौका
मिले उन्हें भी। 


              (2)
मैं झुक कर उसके सामने बैठ गया,
मैं पूछता गया 
वो युवक बताता गया:
दाम, रोपने का तरीका 
मिटटी के प्रकार 
और उर्वरकों का प्रयोग,
सारे बीज जैसे 
जुगनुओं की तरह चमकने लगे,
पहले मैं....मैं...!
और सारे बीजों को 
अंकुरित होने की 
प्रत्याभूति दी उसने,
चमकते हुए बीजों को !


            (3)
इस महानगर में 
मेरे चारों और सीमेंट है,
यहाँ पौधा रोपना तो दूर 
सूँघने तक को मिट्टी नहीं है,
मेरे इस कबाड़नुमा कमरे के
इर्द-गिर्द, किसी कोने में भी नहीं,
मेरी मिटटी तो वहां है 
जहाँ जाना है मुझे कल 
अपने माता-पिता के पास। 



             (4)
हालाँकि, यह भी एक शहर ही है 
लेकिन, पिता जी के भीतर 
कहीं एक किसान जीवित है अभी भी,
मकान के आगे 
यूँ ही नहीं 
लगभग सौ वर्गफूट की जगह 
गंगा की मिट्टी से भरी है। 



          (5)
पिताजी की बहुत इच्छा होती है
ताज़े, बिना उर्वरक वाले 
और कीटनाशक के ज़हर से मुक्त 
हरी भरी सब्ज़ियाँ खाने की,
इसलिए मैंने ख़रीदे 
तरह-तरह के बीज जो 
फूटपाथ पर थैलियों में बन्द 
लालायित थे--
अपने दायित्व के निर्वाह के लिए। 



            (6)
मैं सोचता हूँ अपने बारे में 
कि मैं भी तो एक पौधा ही हूँ,
लेकिन क्या पता कब तक फलूँगा ?
फलूँगा भी तो क्या --
माँ-पिताजी चख पायेंगे 
मेरी मिठास। 
अगर कड़वा निकल गया 
तो कड़वाहट में भी 
नीम-करेले का गुण ढूँढ लेंगे। 



           (7)
क्यूँकि, वो दोनों मेरे रचियेता हैं !
अन्तर यह है कि 
मैं पूर्ण बीज ले जा रहा हूँ 
जबकि उन्होंने कोई 
तीन दशक पहले 
आधे-आधे बीजों को 
प्रकृति के अद्भुत संयोग से 
एक सुन्दर अति सुरक्षित 
सृजन-स्थल में गर्भित किया था था,
और कितने झंझावातों से बचाते हुए 
अब तक पनपाते रहे हैं। 
अपने द्वारा रोपित 
अब तक अफलित पौधे को, 
और आशावान हैं कि 
कभी न कभी तो 
मैं भी फलूँगा
उनके समयातीत होने से पहले। 


(निर्मल अगस्त्य) 

Tuesday, February 24, 2015

"एक ठहरा हुआ ख़त जो भेज न सका"

"एक ठहरा हुआ ख़त जो भेज न सका"


जीने का हुनर तुम रख लो
चाहने की इजाज़त मुझे दे दो,
पाने की तमन्ना तेरा हक़ है 
खोने का हक़ तो मुझे दे दो। 


ऐसे भी हम बन्द गली के 
अन्धे कोने में बसते हैं,
जी चाहे तेरे नूर से चमकें 
लेकिन कहने से डरते हैं 
कुछ भी आखिरी नहीं दुनिया में 
आखिरी सदा का हक़ तो मुझे दे दो,
जीने का हुनर तुम रख लो
चाहने की इजाज़त मुझे दे दो। 


छोड़ सकूँ ये कब होता है 
मेरी साँसें तुझसे जुड़ती हैं,
किस पगडंडी को कोसूं मैं 
हर राह तेरे कूचे मुड़ती है 
टुकड़े कर दो तो भी इनायत 
जुड़ने का हक़ तो मुझे दे दो,
जीने का हुनर तुम रख लो
चाहने की इजाज़त मुझे दे दो,
पाने की तमन्ना तेरा हक़ है 
खोने का हक़ तो मुझे दे दो। 


(निर्मल अगस्त्य)

Wednesday, February 18, 2015

"हम सभी बाट जोहते हैं"

"हम सभी बाट जोहते हैं"

चाँद, सितारे, आकाश, धरती... 
अनुरोध, क्रोध, वेदना और सौंदर्य! 
सभी बाट ही तो जोहते हैं। 
प्रशन्सा की, मुक्ति की, 
आयामों की और एक हाँ भर की! 
जीवन, मृत्यु, संघर्ष, आक्षेप.... सभी। 
परछाई, प्रारब्ध, शब्द... 
कवितायें और उनके अर्थ! 
बाट जोहते हैं 
अपने अस्तित्व के मुकम्मल होने की। 

कुछ होने और कुछ नहीं होने के अन्तराल में 
सारी सारी सृष्टि बाट जोहती है। 
प्रेम, दर्शन, प्रार्थना ओर प्रश्न, 
स्वीकृति की बाट जोहते हैं। 
इसमें नया कुछ भी नहीं है! 
बाट जोहना तो 
विधना का एक मौलिक सूत्र है 
जिसमें विधाता भी बन्धा है। 

कोई विशेष उपक्रम आवश्यक नहीं है 
इस बात पर कि मेरे होने 
और मेरे नहीं होने का जो अन्तराल है 
वह तुम भी हो सकते हो, 
एक सपना भी हो सकता है, 
पिछले जन्म के अनुराग से अनुबन्धित 
कोई आकृति भी हो सकती है! 
एक यक़ीन, एक अनय, एक प्रायश्चित 
या एक संकोच! 

मैं और मेरी कविता... 
उस संकोच के टूटने की बाट जोहते हैं।

(निर्मल अगस्त्य)

   

"हर पल नया है"

"हर पल नया है"

ये पत्तों को भी
सरसराने का अधिकार है,
नये अक्षरों को भी
शब्द बनाने का हक़ है।
हक़ है नये शब्दों का
कि वे भी सुने जायें और छपें,
नये हस्ताक्षरों कों भी
चमकने का हक़ है।
ये दुनिया हर पल नई है
हर अगली सांस नई है
हर अगली सुबह नई है,
सहेजना अच्छी बात है
और ज़रूरी  भी
लेकिन सहेजने के क्रम में
इतनी जगह तो
ज़रूर बनाई जा सकती है
जिसमें आ पायें
नये पत्ते, नये चेहरे
नये ख़्वाब, नई पहल
नये शब्द और नई कलम।

"निर्मल अगस्त्य"

   
   

Friday, January 16, 2015

"वो कह रहा था"



वो वहाँ...
दूर वहाँ,
मिट्टी के टीले पर खड़ा
नीम से कह रहा था कि
देवताओं कि भव्यता
अब उसे उबाऊ लगने लगी है
और कहते-कहते
हवा में अंगुलियाँ घुमा कर
वह लिख भी रहा था।


आसमान - सिटकिनी !
बादल - यवनिका !
सन्दूक - देवता !
उसकी उँगलियाँ यह सब
हवा में उकेर रही हैं।


गहरी सांसें ले रहा था वह
और वहीं था,
और कह रहा था कि
बिना आवेदन दिए
हवा को जी भर महसूस करने में
बड़ा आनन्द है।
कितना खुलापन है यहाँ,
कुलदेवता की कोठरी से
भाग कर आने के बाद
और वह नीम के तने को
अभी-अभी स्कूल से
लौट कर आये बच्चे की तरह
बेहिचक आलिंगन कर सकता है।


उसका कोई फ़िक्रमन्द नहीं है
और इसी वज़ह से ख़ुश है कि
वह हिसाब-क़िताब कि दुविधा से परे है,
वह दुःख में है तो निश्चिन्त है भीड़ से,
तालियों की गड़गड़ाहट से।
अकेला है तो भरा-भरा है !
ख़ुद को पढ़ पा रहा है !


आदमी - देवता !
वैराग्य - तमाशा !
दुःख - स्वतन्त्रता !
उसकी उँगलियाँ यह सब
हवा में उकेर रही हैं।


वह वहीं पर खड़ा
नीम से कह रहा था कि
उसके पास भी घर है
और उसके घर में भी
देवताओं की अच्छी ख़ासी मण्डली है
जिन्हें धूप -दीप दिखने के क्रम में
एक बार उसका हाथ जल भी चुका है।
पड़ोसियों के घरों में भी
कमोबेश यही स्थिति है
और लगभग सबों के यहाँ
कोई एक न एक व्यक्ति
अपना हाथ जला चुका है।


वह अब तक वहीं...
वहीं नीम के नीचे कह रहा था कि
ये देवता भी कितने स्वार्थी हो गए हैं
जो बस अपने अटारियों में बैठे
इन्तज़ार करते रहते हैं
कि कब हममें से कब
किसी का हाथ जल जाए!
हालाँकि, उनके पास पूरा समय है कि
वे अपने पड़ोसी देवों और
रिश्तेदार देवों के घर
भेंट-मुलाक़ात और दुआ सलाम के लिए
जा सकते हैं।
लेकिन क्या करें,
उन्हें भी अपने पसन्द के भाटों को
सुनने की आदत जो पड़ गयी है।


प्रसाद - मतलब !
स्वार्थ - भय !
भक्ति - चौहद्दी !
उसकी उँगलियाँ यह सब
हवा में उकेर रही हैं।


दसों दिशाओं में शब्द
उभर कर पसर रहे थे
और वह कह रहा था कि
देवता भी जब आलसी
और घरघुसना हो चुके हैं
तो हाथ जलने कि वजाय,
खुले खेतों और वादियों कि तरफ़ आकर,
दिन में कम से कम एक बार
आसमान को धन्यवाद कहना,
हवा को पहली प्रेमिका के
शरीर की ख़ुश्बू कि तरह
सीने में भर लेना,
नीम से कुछ बोल बतिया लेना
मिट्टी के टीले पर चढ़ कर
हवा में लिख लेना
कहीं ज़्यादा भव्य और सुन्दर है।


महल - पालतू !
दीप - रज्जू !
आरती - नीम !
उसकी उँगलियाँ यह सब
हवा में उकेर रही हैं।


वो अब भी वहीं था
वहीं पर अड़ा,
उसी नीम के पेड़ के नीचे
मिट्टी के टीले पर चढ़ा,
बस्स... अभ्भी... तो था
और बस कह ही तो रहा था !

(निर्मल अगस्त्य)

2012 की डायरी से .......
   

Wednesday, January 14, 2015

"कोई ख़्वाब जो तुझे"

कोई ख़्वाब जो तुझे 
टोकता ही रहे,
कोई अक्स जो तुझे 
ढूँढता ही रहे। 

आसमाँ को क्यूँ होगा, इंतज़ार बादलों का
बादलों को क्यूँ होगा, इंतज़ार ज़मीं का
बेरुख़ी को क्यूँ होगा, इंतज़ार इल्तिज़ा का 
इल्तिज़ा का क्यूँ होगा, इंतज़ार तड़प का।  


ज़िन्दगी के आधे सच, आधे-आधे झूठे थे
ज़िन्दगी के आधे झूठ, आधे-आधे सच्चे थे, 
ज़िन्दगी ने आधी क़समें आधे मन से खायीं थीं 
ज़िन्दगी ने आधे मन को आधे तन  में पायी थी,
इन आधों में, इन वादों में, ज़िन्दगी कहाँ !


ज़िन्दगी के आधे ख़त, लिफ़ाफे में ही छूट गए 
ज़िंदगी के आधे रिश्ते, आधे पल में टूट गए,
ज़िन्दगी के आधे इरादे हाशियों में जागे थे
ज़िन्दगी के तीनो अक्षर, ढ़ाई छोड़ के भागे थे,
इन वादों में, इन इरादों में, ज़िन्दगी कहाँ !

कोई ख़्वाब जो तुझे 
टोकता ही रहे,
कोई अक्स जो तुझे 
ढूँढता ही रहे। 

आसमाँ को क्यूँ होगा, इंतज़ार बादलों का
बादलों को क्यूँ होगा, इंतज़ार ज़मीं का
बेरुख़ी को क्यूँ होगा, इंतज़ार इल्तिज़ा का 
इल्तिज़ा का क्यूँ होगा, इंतज़ार तड़प का।  

(मैंने इस गीत को एक हिन्दी फ़िल्म के लिए 2011 में लिखा और संगीतबद्ध किया था जिसकी रिकॉर्डिंग भी हो चुकी है लेकिन कई कारणों से फ़िल्म बन नहीं पाई।)
"निर्मल अगस्तय। "


 

Monday, January 12, 2015

"मन मिट्टी, तन बूँद ज़रा सी"

मन मिट्टी, तन बूँद ज़रा सी



मन है मिट्टी,
इसी में सब मिल जाना है!


माँ का अविश्वास
पिता का सन्ताप 
कि आकाश झूठा
पैसा सच्चा,


यह अविश्वास
और  यह सन्ताप 
चूँकि मेरे मन में भी आ बसा है
तो ज़िंदा है,
तैरता रहता है
उड़ता रहता है,
कभी  सिल बन कर जम जाता है
कभी पिघल कर बहने लगता है।


ईमानदारी झूठी,
दुनियावी ज़रूरतें सच्चीं
सच्चाई ख़राब
सफलता अच्छी,
सब समेटता है मन
और सब कुछ टटोल जाता है,
जब कहने के लिए
कहीं से शब्द नहीं मिलते।


और जो मिलते हैं
वो किसी ग़ुम हो गयी  डायरी के
उन पन्नों से भागे हुए हुए होते हैं,
जिन पन्नों को मोड़ कर
निशान लगाया जाता है अक़्सर
कि कुछ लिखना बाक़ी हो शायद।


जो बाक़ी है
वो भी मन है
और जो निबट गया
वो भी मन है।


जी गया !
और जीना है!
या शायद जी लेना है!
ये भी मन ही है।
मन न रहे
तो न अविश्वास रहे न माँ
न सन्ताप रहे न पिता,
न शरीर रहे न कलेवर
न मृत हो पायें न अजर !
पता नहीं मेरे शब्द क्यूँ ज़िंदा हैं 
शायद ये भी मन ही है।

"निर्मल अगस्त्य"
12 जनवरी, 2015
पटना