Sunday, March 8, 2015
Tuesday, February 24, 2015
"एक ठहरा हुआ ख़त जो भेज न सका"
"एक ठहरा हुआ ख़त जो भेज न सका"
जीने का हुनर तुम रख लो
चाहने की इजाज़त मुझे दे दो,
पाने की तमन्ना तेरा हक़ है
खोने का हक़ तो मुझे दे दो।
ऐसे भी हम बन्द गली के
अन्धे कोने में बसते हैं,
जी चाहे तेरे नूर से चमकें
लेकिन कहने से डरते हैं
कुछ भी आखिरी नहीं दुनिया में
आखिरी सदा का हक़ तो मुझे दे दो,
जीने का हुनर तुम रख लो
चाहने की इजाज़त मुझे दे दो।
छोड़ सकूँ ये कब होता है
मेरी साँसें तुझसे जुड़ती हैं,
किस पगडंडी को कोसूं मैं
हर राह तेरे कूचे मुड़ती है
टुकड़े कर दो तो भी इनायत
जुड़ने का हक़ तो मुझे दे दो,
जीने का हुनर तुम रख लो
चाहने की इजाज़त मुझे दे दो,
पाने की तमन्ना तेरा हक़ है
खोने का हक़ तो मुझे दे दो।
(निर्मल अगस्त्य)
Wednesday, February 18, 2015
"हम सभी बाट जोहते हैं"
"हम सभी बाट जोहते हैं"
चाँद, सितारे, आकाश, धरती...
अनुरोध, क्रोध, वेदना और सौंदर्य!
सभी बाट ही तो जोहते हैं।
प्रशन्सा की, मुक्ति की,
आयामों की और एक हाँ भर की!
जीवन, मृत्यु, संघर्ष, आक्षेप.... सभी।
परछाई, प्रारब्ध, शब्द...
कवितायें और उनके अर्थ!
बाट जोहते हैं
अपने अस्तित्व के मुकम्मल होने की।
कुछ होने और कुछ नहीं होने के अन्तराल में
सारी सारी सृष्टि बाट जोहती है।
प्रेम, दर्शन, प्रार्थना ओर प्रश्न,
स्वीकृति की बाट जोहते हैं।
इसमें नया कुछ भी नहीं है!
बाट जोहना तो
विधना का एक मौलिक सूत्र है
जिसमें विधाता भी बन्धा है।
कोई विशेष उपक्रम आवश्यक नहीं है
इस बात पर कि मेरे होने
और मेरे नहीं होने का जो अन्तराल है
वह तुम भी हो सकते हो,
एक सपना भी हो सकता है,
पिछले जन्म के अनुराग से अनुबन्धित
कोई आकृति भी हो सकती है!
एक यक़ीन, एक अनय, एक प्रायश्चित
या एक संकोच!
मैं और मेरी कविता...
उस संकोच के टूटने की बाट जोहते हैं।
(निर्मल अगस्त्य)
"हर पल नया है"
"हर पल नया है"
नये पत्तों को भी
सरसराने का अधिकार है,
नये अक्षरों को भी
शब्द बनाने का हक़ है।
हक़ है नये शब्दों का
कि वे भी सुने जायें और छपें,
नये हस्ताक्षरों कों भी
चमकने का हक़ है।
ये दुनिया हर पल नई है
हर अगली सांस नई है
हर अगली सुबह नई है,
सहेजना अच्छी बात है
और ज़रूरी भी
लेकिन सहेजने के क्रम में
इतनी जगह तो
ज़रूर बनाई जा सकती है
जिसमें आ पायें
नये पत्ते, नये चेहरे
नये ख़्वाब, नई पहल
नये शब्द और नई कलम।
"निर्मल अगस्त्य"
नये पत्तों को भी
सरसराने का अधिकार है,
नये अक्षरों को भी
शब्द बनाने का हक़ है।
हक़ है नये शब्दों का
कि वे भी सुने जायें और छपें,
नये हस्ताक्षरों कों भी
चमकने का हक़ है।
ये दुनिया हर पल नई है
हर अगली सांस नई है
हर अगली सुबह नई है,
सहेजना अच्छी बात है
और ज़रूरी भी
लेकिन सहेजने के क्रम में
इतनी जगह तो
ज़रूर बनाई जा सकती है
जिसमें आ पायें
नये पत्ते, नये चेहरे
नये ख़्वाब, नई पहल
नये शब्द और नई कलम।
"निर्मल अगस्त्य"
Friday, January 16, 2015
"वो कह रहा था"
वो वहाँ...
दूर वहाँ,
मिट्टी के टीले पर खड़ा
नीम से कह रहा था कि
देवताओं कि भव्यता
अब उसे उबाऊ लगने लगी है
और कहते-कहते
हवा में अंगुलियाँ घुमा कर
वह लिख भी रहा था।
आसमान - सिटकिनी !
बादल - यवनिका !
सन्दूक - देवता !
उसकी उँगलियाँ यह सब
हवा में उकेर रही हैं।
गहरी सांसें ले रहा था वह
और वहीं था,
और कह रहा था कि
बिना आवेदन दिए
हवा को जी भर महसूस करने में
बड़ा आनन्द है।
कितना खुलापन है यहाँ,
कुलदेवता की कोठरी से
भाग कर आने के बाद
और वह नीम के तने को
अभी-अभी स्कूल से
लौट कर आये बच्चे की तरह
बेहिचक आलिंगन कर सकता है।
उसका कोई फ़िक्रमन्द नहीं है
और इसी वज़ह से ख़ुश है कि
वह हिसाब-क़िताब कि दुविधा से परे है,
वह दुःख में है तो निश्चिन्त है भीड़ से,
तालियों की गड़गड़ाहट से।
अकेला है तो भरा-भरा है !
ख़ुद को पढ़ पा रहा है !
आदमी - देवता !
वैराग्य - तमाशा !
दुःख - स्वतन्त्रता !
उसकी उँगलियाँ यह सब
हवा में उकेर रही हैं।
वह वहीं पर खड़ा
नीम से कह रहा था कि
उसके पास भी घर है
और उसके घर में भी
देवताओं की अच्छी ख़ासी मण्डली है
जिन्हें धूप -दीप दिखने के क्रम में
एक बार उसका हाथ जल भी चुका है।
पड़ोसियों के घरों में भी
कमोबेश यही स्थिति है
और लगभग सबों के यहाँ
कोई एक न एक व्यक्ति
अपना हाथ जला चुका है।
वह अब तक वहीं...
वहीं नीम के नीचे कह रहा था कि
ये देवता भी कितने स्वार्थी हो गए हैं
जो बस अपने अटारियों में बैठे
इन्तज़ार करते रहते हैं
कि कब हममें से कब
किसी का हाथ जल जाए!
हालाँकि, उनके पास पूरा समय है कि
वे अपने पड़ोसी देवों और
रिश्तेदार देवों के घर
भेंट-मुलाक़ात और दुआ सलाम के लिए
जा सकते हैं।
लेकिन क्या करें,
उन्हें भी अपने पसन्द के भाटों को
सुनने की आदत जो पड़ गयी है।
प्रसाद - मतलब !
स्वार्थ - भय !
भक्ति - चौहद्दी !
उसकी उँगलियाँ यह सब
हवा में उकेर रही हैं।
दसों दिशाओं में शब्द
उभर कर पसर रहे थे
और वह कह रहा था कि
देवता भी जब आलसी
और घरघुसना हो चुके हैं
तो हाथ जलने कि वजाय,
खुले खेतों और वादियों कि तरफ़ आकर,
दिन में कम से कम एक बार
आसमान को धन्यवाद कहना,
हवा को पहली प्रेमिका के
शरीर की ख़ुश्बू कि तरह
सीने में भर लेना,
नीम से कुछ बोल बतिया लेना
मिट्टी के टीले पर चढ़ कर
हवा में लिख लेना
कहीं ज़्यादा भव्य और सुन्दर है।
महल - पालतू !
दीप - रज्जू !
आरती - नीम !
उसकी उँगलियाँ यह सब
हवा में उकेर रही हैं।
वो अब भी वहीं था
वहीं पर अड़ा,
उसी नीम के पेड़ के नीचे
मिट्टी के टीले पर चढ़ा,
बस्स... अभ्भी... तो था
और बस कह ही तो रहा था !
(निर्मल अगस्त्य)
2012 की डायरी से .......
Wednesday, January 14, 2015
"कोई ख़्वाब जो तुझे"
कोई ख़्वाब जो तुझे
टोकता ही रहे,
कोई अक्स जो तुझे
ढूँढता ही रहे।
आसमाँ को क्यूँ होगा, इंतज़ार बादलों का
बादलों को क्यूँ होगा, इंतज़ार ज़मीं का
बेरुख़ी को क्यूँ होगा, इंतज़ार इल्तिज़ा का
इल्तिज़ा का क्यूँ होगा, इंतज़ार तड़प का।
ज़िन्दगी के आधे सच, आधे-आधे झूठे थे
ज़िन्दगी के आधे झूठ, आधे-आधे सच्चे थे,
ज़िन्दगी ने आधी क़समें आधे मन से खायीं थीं
ज़िन्दगी ने आधे मन को आधे तन में पायी थी,
इन आधों में, इन वादों में, ज़िन्दगी कहाँ !
ज़िन्दगी के आधे ख़त, लिफ़ाफे में ही छूट गए
ज़िंदगी के आधे रिश्ते, आधे पल में टूट गए,
ज़िन्दगी के आधे इरादे हाशियों में जागे थे
ज़िन्दगी के तीनो अक्षर, ढ़ाई छोड़ के भागे थे,
इन वादों में, इन इरादों में, ज़िन्दगी कहाँ !
कोई ख़्वाब जो तुझे
टोकता ही रहे,
कोई अक्स जो तुझे
ढूँढता ही रहे।
आसमाँ को क्यूँ होगा, इंतज़ार बादलों का
बादलों को क्यूँ होगा, इंतज़ार ज़मीं का
बेरुख़ी को क्यूँ होगा, इंतज़ार इल्तिज़ा का
इल्तिज़ा का क्यूँ होगा, इंतज़ार तड़प का।
(मैंने इस गीत को एक हिन्दी फ़िल्म के लिए 2011 में लिखा और संगीतबद्ध किया था जिसकी रिकॉर्डिंग भी हो चुकी है लेकिन कई कारणों से फ़िल्म बन नहीं पाई।)
"निर्मल अगस्तय। "
Monday, January 12, 2015
"मन मिट्टी, तन बूँद ज़रा सी"
मन मिट्टी, तन बूँद ज़रा सी
मन है मिट्टी,
इसी में सब मिल जाना है!
माँ का अविश्वास
पिता का सन्ताप
कि आकाश झूठा
पैसा सच्चा,
यह अविश्वास
और यह सन्ताप
चूँकि मेरे मन में भी आ बसा है
तो ज़िंदा है,
तैरता रहता है
उड़ता रहता है,
कभी सिल बन कर जम जाता है
कभी पिघल कर बहने लगता है।
ईमानदारी झूठी,
दुनियावी ज़रूरतें सच्चीं
सच्चाई ख़राब
सफलता अच्छी,
सब समेटता है मन
और सब कुछ टटोल जाता है,
जब कहने के लिए
कहीं से शब्द नहीं मिलते।
और जो मिलते हैं
वो किसी ग़ुम हो गयी डायरी के
उन पन्नों से भागे हुए हुए होते हैं,
जिन पन्नों को मोड़ कर
निशान लगाया जाता है अक़्सर
कि कुछ लिखना बाक़ी हो शायद।
जो बाक़ी है
वो भी मन है
और जो निबट गया
वो भी मन है।
जी गया !
और जीना है!
या शायद जी लेना है!
ये भी मन ही है।
मन न रहे
तो न अविश्वास रहे न माँ
न सन्ताप रहे न पिता,
न शरीर रहे न कलेवर
न मृत हो पायें न अजर !
पता नहीं मेरे शब्द क्यूँ ज़िंदा हैं
शायद ये भी मन ही है।
"निर्मल अगस्त्य"
12 जनवरी, 2015
पटना
मन है मिट्टी,
इसी में सब मिल जाना है!
माँ का अविश्वास
पिता का सन्ताप
कि आकाश झूठा
पैसा सच्चा,
यह अविश्वास
और यह सन्ताप
चूँकि मेरे मन में भी आ बसा है
तो ज़िंदा है,
तैरता रहता है
उड़ता रहता है,
कभी सिल बन कर जम जाता है
कभी पिघल कर बहने लगता है।
ईमानदारी झूठी,
दुनियावी ज़रूरतें सच्चीं
सच्चाई ख़राब
सफलता अच्छी,
सब समेटता है मन
और सब कुछ टटोल जाता है,
जब कहने के लिए
कहीं से शब्द नहीं मिलते।
और जो मिलते हैं
वो किसी ग़ुम हो गयी डायरी के
उन पन्नों से भागे हुए हुए होते हैं,
जिन पन्नों को मोड़ कर
निशान लगाया जाता है अक़्सर
कि कुछ लिखना बाक़ी हो शायद।
जो बाक़ी है
वो भी मन है
और जो निबट गया
वो भी मन है।
जी गया !
और जीना है!
या शायद जी लेना है!
ये भी मन ही है।
मन न रहे
तो न अविश्वास रहे न माँ
न सन्ताप रहे न पिता,
न शरीर रहे न कलेवर
न मृत हो पायें न अजर !
पता नहीं मेरे शब्द क्यूँ ज़िंदा हैं
शायद ये भी मन ही है।
"निर्मल अगस्त्य"
12 जनवरी, 2015
पटना
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