Wednesday, December 30, 2015

"अभी हूँ!"


यह बस आज़ादी देने वाला जैसा ही था,
गरमा-गरम चाय की प्याली के साथ
घास पर लेट कर उपन्यास पढ़ने जैसा!
वह यूँ ही मुस्कुराता जब दोस्त पूछते- क्या हुआ?
वो उनसे कहता कि मैं हूँ अभी और बस ख़ुश हूँ!
बस्स...! उतना ही, जितनी चीनी की ज़रुरत है
बिना दूध वाली एक कप चाय के लिये
और आनन्द ले रहा हूँ छोटी-छोटी चीज़ों का,
जिन्हें शब्दकोषों में बहुत धीरे-धीरे सम्भाल कर
खरोंचों से बचा-बचा कर रखा जाता है।


मैं बस अच्छा हूँ, बस्स... अच्छा!
एक चम्मच चायपत्ती जितना,
न कम... न ज़्यादा!
और घास पर लेट कर
एक अच्छा सा उपन्यास पढ़ना चाहता हूँ, ठहर-ठहर कर!
शब्दों की तरह सुन्दर दिखना चाहता हूँ,
विरामों के साथ बढ़ते हुये और चाय पीते हुये।


और क्या?
आगे?
वह कहता है- मज़े में हूँ,
बस थोड़ा छुप-छुपा कर आया हूँ
और बस उतना ही जितनी हरियाली इन घासों में
और नीलापन आसमान में दिख रहा है।
आगे तो कुछ नहीं!
ज़रा जाने से पहले चाय पीना चाहता हूँ
और उपन्यास को अपने मन मुताबिक अन्तराल में पढ़ना चाहता हूँ,
अक्षरों की तरह टप्प... से बिखरना चाहता हूँ!
और वैसे भी यहाँ पहले से बढि़या है,
सामने उस पेड़ पर अभी-अभी एक चिड़ियां 
मुँह में तिनका लेकर दसवीं या शायद बारहवीं बार लौटी है।


यहाँ कम से कम मेरे उपर गिर पड़ने के लिये
आसमान के अलावा कुछ ख़ास है भी नहीं।
चमकती धूप तो है लेकिन हमेशा की तरह
उसे आज भी किसी से मिलने जाना है
और बारिश जो होते-होते रह गयी है,
वहाँ... उस तालाब में अपना अक्स देखने में
नर्गिस की तरह घन्टों से खोई है।

ठीक है.... फिर कल?
वह चाय की प्याली उठाता है और कहता है
कि कल के बारे में कुछ तय नहीं
और आज तो मैं बस यहीं हूँ,
धीरे-धीरे मद्धिम होता हुआ,
शिथिल होता हुआ!
चाय पीने के लिये,
घास पर लेटने के लिये,
बेहद वाली ज़िन्दगी से छुप-छुपा कर
छोटी-छोटी हदों वाली ज़िन्दगी के बेहद पास,
भर साँस उजास में!
भागम-भाग से अवकाश में!
  

"निर्मल अगस्त्य" 
02:32 AM
31-12-2015
पटना 

Tuesday, December 29, 2015

"विदा के वक़्त"


इससे क्या फ़र्क पड़ता 
अगर दूर जाते वक़्त हम 
हाथ हिला ही देते? 

शायद...! 
यह एक ब्रह्माण्ड जैसा शब्द है। 
शायद कह कर 
बहुत गहरे तक निश्चिन्त हुआ जा सकता है,
शायद कह कर  
सम्पूर्ण सृष्टि को 
हाथ हिलाने की तरह मान ले सकते थे हम। 
लेकिन ओझल हो सकने वाला दूर ना सही, 
दूर वाला दूर तो जा ही चुका था मैं!
और पहले जैसा होता रहा था,
तुम्हारे और मेरे बीच में 
कुछ और भी तो आ सकता था। 
जैसे परिन्दे, खेलता हुआ बच्चा, 
पेड़ से विलग कर नीचे गिर रहा कोई पत्ता। 


विदा जीवन की सुन्दरतम कविता है! 
नीरद, निर्मल, निर्लेप! 
बहुत चुने हुये लम्हों में से 
चुने हुये पलों को 
विदा के सम्मान के लिये चुना जाता है, 
इन्हें प्रलय के 
प्रग्लभ सौंदर्य की तरह 
बीतते देखने में आनन्द है, 
इसी के बाद नई शुरूआत है। 


तुम्हारी डबडबाई आँखों और 
मेरी मुस्कुराहट के बीच 
परिन्दा, खेलता हुआ बच्चा, 
पेड़ से विलग कर नीचे गिरता पत्ता 
और ब्रह्माण्ड सा शायद 
तो पहले से था, विहंगम! 
और कोई ज़रूरी तो नहीं था 
कि जिधर मैं बढ़ रहा था 
उधर कोई और 
पहले गया भी हो। 


तो रहने दो...! 
ये हम दोनों ने 
ऐसे भी तो एक साथ ही कहा था। 
चुने हुये लम्हों में से 
चुने हुये पलों की तरह, 
विदा के सम्मान के लिये खड़े 
हम भी तो शायद जैसा अलग-अलग 
कितने अच्छे दिखे थे, अपरक्राम्य! 


अलग-अलग ब्रह्मांड होना 
अजनबी हो जाने से सदैव अच्छा होता है। 
क्या फ़र्क पड़ता अगर दूर जाते वक़्त हम 
हाथ हिला ही देते?
    

निर्मल अगस्त्य। 
30-12-2015
2:02 AM
पटना 















Thursday, December 10, 2015

"हम ही थे।"


हम सभी थे,
लगे-भिड़े 
व्यस्तता घुटनों तक मोड़े। 

परियों की कहानियों की किताबें, 
छतरियों की टूटी कमानियाँ 
दैनिक ख़र्च की डायरी 
अख़बारों के ढ़ेर 
और अपने ही आकार में 
पुराने पर गये 
जूतों के आस-पास। 

हम सभी थे, 
बोलते-बतियाते 
छाँटते-छूँटते। 

कुर्ते, 
जो उदासी ओढ़ चुके थे 
कुछ गुल्लक 
जिनमें अब 
खनक का संगीत नही था, 
कूँये की चरखी 
ज़ंग पहनती बाल्टी 
रस से बेज़ार कुछ रस्सियाँ। 

हम सभी थे, 
जुते-पुते 
समेटते-उठाते। 

तस्वीरें 
जो कभी बोलती थीं,
कूचियाँ 
जिनमें रंग अभी भी पसरे थे, 
गंडे और तावीज़  
जिसमें कभी  मन्त्रों का बसेरा था। 

हम सभी थे, 
पोछते-पाछते 
धोते-सुखाते। 

छिपा के रखी गई कवितायें 
भटकाव के साक्षी टिन के बक्से 
अप्रकाशित पान्डुलिपियों की फ़ाईलें 
पत्रों के बन्डल, 

हम सभी थे, 
चुनते-चुनवाते 
बेचते-बाचते। 

इसके उपरान्त घर पुनः 
सिली हुई कमीज़ की तरह 
लगने लगा था 

और हम सभी थे 
बटनों की तरह सिले-कढ़े 
अपने-अपने हिस्से की खोहों में 
बीतते-समाते 
धागे से बोलते-बतियाते 
जुड़ते-जुड़ाते 

हम ही थे, 
वापस से अवशेष 
बोते-उगाते।
  
निर्मल अगस्त्य। 
12:57 AM
11-12-2015
पटना 

Sunday, December 6, 2015

इति...!

इति

ये एक 
बहुत लम्बे सिलसिले का 
छोटा सा वाक़या है। 
कमरे में आलमारी है 
आलमारी में दराज़े हैं 
और दराज़ों में 
हाशियों से भागी 
कुछ कवितायें हैं 
जिनके हर्फों में उलझने के बाद 
किसी और ग़म में उलझने के लिये 
लिखे गये कुछ फ़लसफे हैं 
जिन्हे परोस रहा हूँ 
कुनबे से भगा दिये गये 
कुछ अक्षरों से बने दोनों में 
बाग़ी स्याही की चटनी के साथ,
मैं कुछ ख़ास मेज़बानी नहीं जानता 
लेकिन उम्मीद करता हूँ 
कि तुम मेहमान ख़ास निकलोगे...।

निर्मल अगस्त्य 
कविता संग्रह "इसी कुछ में" से। 

Sunday, November 22, 2015

गान्धारी_पट्टी वाली

गान्धारी_पट्टी वाली 


उस आशीर्वाद से सदैव दुःख उपजता है 
जो छलने के पहले या छल लेने के 
बाद दिया जाता है। 
उस छमायाचना से सदैव घृणा उपजती है 
जो अहंकार को कुछ पलों के लिए 
छुपाने के लिए की जाती है। 


लोग उनसे अविश्वास सीख जाते हैं 
जो स्वंय अविश्वास में जीता रहा हो 
खोखली विनम्रता ओढ़े हुए
किसी के विस्तार को काटने में मगन,
लेकिन उनसे कुछ नहीं ले पाते 
जो चिल्लाता रहा हो 
अपशब्द बोलता रहा हो 
किसी के विस्तार और प्रगल्भता के लिए। 


धरती पर कभी एक गान्धारी हुआ करती थी
अमृत पी के आई थी शायद,
अभी भी बहुतों में जीवित है। 
आँख वाले ये सोच रहे हैं 
कि सम्बन्धों में ये परेशानी क्यूँ है,
कुछ लोगों के अन्दर छिपी गान्धारी ये सोच रही है
कि बाक़ी करम के मारों की आँख क्यूँ  है।        
 

निर्मल अगस्त्य 
23-11-2015
पटना। 

Thursday, November 5, 2015

रुकूँ.......? या जाऊँ........?


कैसी कशिश है ये कैसी कहानी 
कि लब हैं लरजते, है आँखों में पानी.. 
कि कल जा का के मरहम ने 
फफोलों से पूछा है---


रुकूँ...?या जाऊँ...?


बेबस झरोखों में हवा डोलती है 
जुल्फें तुम्हारी कई रात घोलती हैं 
तुझे जी के मरने लगे हम हमेशा 
बाग़ी कलम मेरी ये राज़ खोलती है 


कि कल जा के साँसों ने 
सीने से पूछा है 
रुकूँ......?या जाऊँ........? 


कोई हक़ नहीं तुझपे मैं ये जानता हूँ 
फिर भी तुझे एक मेहर मानता हूँ 
मेरी ज़िंदगी है शोलों के काबिज़ 
तेरे ओठों पे चमकती अब्र मांगता हूँ 


कि  कल जा के धड़कन ने 
दिल से पूछा है 
रुकूँ.......? या जाऊँ........?


कैसी कशिश है ये कैसी कहानी 
कि लब हैं लरजते, है आँखों में पानी.. 
कि कल जा का के मरहम ने 
फफोलों से पूछा है ----


रुकूँ......?या जाऊँ........?

Saturday, October 17, 2015

मन मिट्टी तन बूँद ज़रा सी !इसलिये मैं लिख रहा हूँ!

मैं लिख रहा हूँ !
शायद इसलिये कि
बोलते वक़्त मेरी आवारगी में
सुबह उतर आती है,
इसलिये कि
बोलते-बोलते मैं कभी-कभी
आसमान को पुकारने लगता हूँ।
आसमान जो मेरा भी है
तुम्हारा भी है
जिसके पास तुम्हारे लिये
चाँद है, सितारे हैं,
मौज है, उड़ान है!
और मेरे लिये
एकांत है, अकेलापन है,
तल्ख़ी है, ख़ामोशी है!
इसलिये मैं लिख रहा हूँ।

मैं लिख रहा हूँ!
शायद इसलिये कि
बोलते वक़्त मेरी आखों में
लम्हें उभरने लगते है,
जहाँ से होकर
तुम भी गुज़रे थे
मैं भी गुज़रा था,
जिसमें तुम्हारे लिये उत्सव है,
मौसम है, चाँदनी है, बरसात है!
और मेरे लिये ख़्याल है,
कविता है, आलाप है, सुकून है!
इसलिये मैं लिख रहा हूँ।

मैं लिख रहा हूँ!
शायद इसलिये कि
बोलते वक़्त मेरे शब्दों में
अब शाम बहुत तेज़ी से ढ़लने लगती है
जिसके पास तुम्हारे लिये
क़ायदा है, चहारदीवारी है
दीया-बाती है, प्रार्थना है!
और मेरे लिये प्रवास है, यायावरी है,
जेठ है, मर्सिया है,
धूल है, चौखट है
इसलिये मैं लिख रहा हूँ!

निर्मल अगस्त्य
18-10-2015
पटना, बिहार। 

Tuesday, April 7, 2015

"दूसरी कहानी"

"दूसरी कहानी"


ये कैसी कहानी है-
ख़त्म ही नहीं होती,
जैसे ही लगता है
की अब अन्त होगा कहानी का
इस पात्र के बीत जाने के बाद,
वेताल की तरह फ़्लैशबैक
वापस कहानी के कन्धे पर सवार हो जाता है।

नफ़रत कर लेने से प्यार
ख़त्म नहीं हो जाता,
हाँ, दूसरे पात्र के आ जाने से
पहला पात्र
गुमशुदा सा लगने लगता है,
फिर भी यदा-कदा
वह ऐसे टपक जाता है
जैसे फ्रेम के अन्दर से
तस्वीर क्षण भर को मुस्कुरा दे
और पता भी न चले।

कहानी तो बढ़ रही है
और खिंच भी रही है,
साथ ही खींच रही है
कहानीकार को भी,
जो इस खिंचती कहानी के कारण
शायद ही अब,
प्रेमकहानी का
दूसरा अध्याय लिख पाये
और निरन्तर उलझा रहे,
पहले प्रेमकहानी में से
सहसा जीवित हो उठते
पात्रों के कारण

निर्मल अगस्त्य   

Sunday, March 8, 2015

"शरत चटर्जी रोड के फ्लैट में लिखी एक कविता !"

"शरत चटर्जी रोड के फ्लैट में लिखी एक कविता !"
----------------------------------------------------------
                       

               (1)
फूटपाथ पर दिखा एक सांवला सा युवक 
दमदम मेट्रो स्टेशन से बाहर 
जो घिरा हुआ था,
खुले, अधखुले 
छोटे-छोटे कपड़ों की थैलियों से,
उनमें से झाँक रहे थे- "बीज" !
तरह-तरह के बीज ! 
कद्दू, करेला, सीम, कुम्हड़ा, खीरा
लाल साग, डांटा साग, 
बीन्स और न जाने क्या-क्या। 
काले बादल आकाश से 
बरसने को व्याकुल
चौमासे के दूसरे महीने में 
और व्याकुल लग रहे थे कि 
कोई ले जाए हमें भी 
इस श्रावण मास में,
और अपने बीज होने के 
दायित्व के निर्वाह करने का मौका
मिले उन्हें भी। 


              (2)
मैं झुक कर उसके सामने बैठ गया,
मैं पूछता गया 
वो युवक बताता गया:
दाम, रोपने का तरीका 
मिटटी के प्रकार 
और उर्वरकों का प्रयोग,
सारे बीज जैसे 
जुगनुओं की तरह चमकने लगे,
पहले मैं....मैं...!
और सारे बीजों को 
अंकुरित होने की 
प्रत्याभूति दी उसने,
चमकते हुए बीजों को !


            (3)
इस महानगर में 
मेरे चारों और सीमेंट है,
यहाँ पौधा रोपना तो दूर 
सूँघने तक को मिट्टी नहीं है,
मेरे इस कबाड़नुमा कमरे के
इर्द-गिर्द, किसी कोने में भी नहीं,
मेरी मिटटी तो वहां है 
जहाँ जाना है मुझे कल 
अपने माता-पिता के पास। 



             (4)
हालाँकि, यह भी एक शहर ही है 
लेकिन, पिता जी के भीतर 
कहीं एक किसान जीवित है अभी भी,
मकान के आगे 
यूँ ही नहीं 
लगभग सौ वर्गफूट की जगह 
गंगा की मिट्टी से भरी है। 



          (5)
पिताजी की बहुत इच्छा होती है
ताज़े, बिना उर्वरक वाले 
और कीटनाशक के ज़हर से मुक्त 
हरी भरी सब्ज़ियाँ खाने की,
इसलिए मैंने ख़रीदे 
तरह-तरह के बीज जो 
फूटपाथ पर थैलियों में बन्द 
लालायित थे--
अपने दायित्व के निर्वाह के लिए। 



            (6)
मैं सोचता हूँ अपने बारे में 
कि मैं भी तो एक पौधा ही हूँ,
लेकिन क्या पता कब तक फलूँगा ?
फलूँगा भी तो क्या --
माँ-पिताजी चख पायेंगे 
मेरी मिठास। 
अगर कड़वा निकल गया 
तो कड़वाहट में भी 
नीम-करेले का गुण ढूँढ लेंगे। 



           (7)
क्यूँकि, वो दोनों मेरे रचियेता हैं !
अन्तर यह है कि 
मैं पूर्ण बीज ले जा रहा हूँ 
जबकि उन्होंने कोई 
तीन दशक पहले 
आधे-आधे बीजों को 
प्रकृति के अद्भुत संयोग से 
एक सुन्दर अति सुरक्षित 
सृजन-स्थल में गर्भित किया था था,
और कितने झंझावातों से बचाते हुए 
अब तक पनपाते रहे हैं। 
अपने द्वारा रोपित 
अब तक अफलित पौधे को, 
और आशावान हैं कि 
कभी न कभी तो 
मैं भी फलूँगा
उनके समयातीत होने से पहले। 


(निर्मल अगस्त्य) 

Tuesday, February 24, 2015

"एक ठहरा हुआ ख़त जो भेज न सका"

"एक ठहरा हुआ ख़त जो भेज न सका"


जीने का हुनर तुम रख लो
चाहने की इजाज़त मुझे दे दो,
पाने की तमन्ना तेरा हक़ है 
खोने का हक़ तो मुझे दे दो। 


ऐसे भी हम बन्द गली के 
अन्धे कोने में बसते हैं,
जी चाहे तेरे नूर से चमकें 
लेकिन कहने से डरते हैं 
कुछ भी आखिरी नहीं दुनिया में 
आखिरी सदा का हक़ तो मुझे दे दो,
जीने का हुनर तुम रख लो
चाहने की इजाज़त मुझे दे दो। 


छोड़ सकूँ ये कब होता है 
मेरी साँसें तुझसे जुड़ती हैं,
किस पगडंडी को कोसूं मैं 
हर राह तेरे कूचे मुड़ती है 
टुकड़े कर दो तो भी इनायत 
जुड़ने का हक़ तो मुझे दे दो,
जीने का हुनर तुम रख लो
चाहने की इजाज़त मुझे दे दो,
पाने की तमन्ना तेरा हक़ है 
खोने का हक़ तो मुझे दे दो। 


(निर्मल अगस्त्य)

Wednesday, February 18, 2015

"हम सभी बाट जोहते हैं"

"हम सभी बाट जोहते हैं"

चाँद, सितारे, आकाश, धरती... 
अनुरोध, क्रोध, वेदना और सौंदर्य! 
सभी बाट ही तो जोहते हैं। 
प्रशन्सा की, मुक्ति की, 
आयामों की और एक हाँ भर की! 
जीवन, मृत्यु, संघर्ष, आक्षेप.... सभी। 
परछाई, प्रारब्ध, शब्द... 
कवितायें और उनके अर्थ! 
बाट जोहते हैं 
अपने अस्तित्व के मुकम्मल होने की। 

कुछ होने और कुछ नहीं होने के अन्तराल में 
सारी सारी सृष्टि बाट जोहती है। 
प्रेम, दर्शन, प्रार्थना ओर प्रश्न, 
स्वीकृति की बाट जोहते हैं। 
इसमें नया कुछ भी नहीं है! 
बाट जोहना तो 
विधना का एक मौलिक सूत्र है 
जिसमें विधाता भी बन्धा है। 

कोई विशेष उपक्रम आवश्यक नहीं है 
इस बात पर कि मेरे होने 
और मेरे नहीं होने का जो अन्तराल है 
वह तुम भी हो सकते हो, 
एक सपना भी हो सकता है, 
पिछले जन्म के अनुराग से अनुबन्धित 
कोई आकृति भी हो सकती है! 
एक यक़ीन, एक अनय, एक प्रायश्चित 
या एक संकोच! 

मैं और मेरी कविता... 
उस संकोच के टूटने की बाट जोहते हैं।

(निर्मल अगस्त्य)

   

"हर पल नया है"

"हर पल नया है"

ये पत्तों को भी
सरसराने का अधिकार है,
नये अक्षरों को भी
शब्द बनाने का हक़ है।
हक़ है नये शब्दों का
कि वे भी सुने जायें और छपें,
नये हस्ताक्षरों कों भी
चमकने का हक़ है।
ये दुनिया हर पल नई है
हर अगली सांस नई है
हर अगली सुबह नई है,
सहेजना अच्छी बात है
और ज़रूरी  भी
लेकिन सहेजने के क्रम में
इतनी जगह तो
ज़रूर बनाई जा सकती है
जिसमें आ पायें
नये पत्ते, नये चेहरे
नये ख़्वाब, नई पहल
नये शब्द और नई कलम।

"निर्मल अगस्त्य"

   
   

Friday, January 16, 2015

"वो कह रहा था"



वो वहाँ...
दूर वहाँ,
मिट्टी के टीले पर खड़ा
नीम से कह रहा था कि
देवताओं कि भव्यता
अब उसे उबाऊ लगने लगी है
और कहते-कहते
हवा में अंगुलियाँ घुमा कर
वह लिख भी रहा था।


आसमान - सिटकिनी !
बादल - यवनिका !
सन्दूक - देवता !
उसकी उँगलियाँ यह सब
हवा में उकेर रही हैं।


गहरी सांसें ले रहा था वह
और वहीं था,
और कह रहा था कि
बिना आवेदन दिए
हवा को जी भर महसूस करने में
बड़ा आनन्द है।
कितना खुलापन है यहाँ,
कुलदेवता की कोठरी से
भाग कर आने के बाद
और वह नीम के तने को
अभी-अभी स्कूल से
लौट कर आये बच्चे की तरह
बेहिचक आलिंगन कर सकता है।


उसका कोई फ़िक्रमन्द नहीं है
और इसी वज़ह से ख़ुश है कि
वह हिसाब-क़िताब कि दुविधा से परे है,
वह दुःख में है तो निश्चिन्त है भीड़ से,
तालियों की गड़गड़ाहट से।
अकेला है तो भरा-भरा है !
ख़ुद को पढ़ पा रहा है !


आदमी - देवता !
वैराग्य - तमाशा !
दुःख - स्वतन्त्रता !
उसकी उँगलियाँ यह सब
हवा में उकेर रही हैं।


वह वहीं पर खड़ा
नीम से कह रहा था कि
उसके पास भी घर है
और उसके घर में भी
देवताओं की अच्छी ख़ासी मण्डली है
जिन्हें धूप -दीप दिखने के क्रम में
एक बार उसका हाथ जल भी चुका है।
पड़ोसियों के घरों में भी
कमोबेश यही स्थिति है
और लगभग सबों के यहाँ
कोई एक न एक व्यक्ति
अपना हाथ जला चुका है।


वह अब तक वहीं...
वहीं नीम के नीचे कह रहा था कि
ये देवता भी कितने स्वार्थी हो गए हैं
जो बस अपने अटारियों में बैठे
इन्तज़ार करते रहते हैं
कि कब हममें से कब
किसी का हाथ जल जाए!
हालाँकि, उनके पास पूरा समय है कि
वे अपने पड़ोसी देवों और
रिश्तेदार देवों के घर
भेंट-मुलाक़ात और दुआ सलाम के लिए
जा सकते हैं।
लेकिन क्या करें,
उन्हें भी अपने पसन्द के भाटों को
सुनने की आदत जो पड़ गयी है।


प्रसाद - मतलब !
स्वार्थ - भय !
भक्ति - चौहद्दी !
उसकी उँगलियाँ यह सब
हवा में उकेर रही हैं।


दसों दिशाओं में शब्द
उभर कर पसर रहे थे
और वह कह रहा था कि
देवता भी जब आलसी
और घरघुसना हो चुके हैं
तो हाथ जलने कि वजाय,
खुले खेतों और वादियों कि तरफ़ आकर,
दिन में कम से कम एक बार
आसमान को धन्यवाद कहना,
हवा को पहली प्रेमिका के
शरीर की ख़ुश्बू कि तरह
सीने में भर लेना,
नीम से कुछ बोल बतिया लेना
मिट्टी के टीले पर चढ़ कर
हवा में लिख लेना
कहीं ज़्यादा भव्य और सुन्दर है।


महल - पालतू !
दीप - रज्जू !
आरती - नीम !
उसकी उँगलियाँ यह सब
हवा में उकेर रही हैं।


वो अब भी वहीं था
वहीं पर अड़ा,
उसी नीम के पेड़ के नीचे
मिट्टी के टीले पर चढ़ा,
बस्स... अभ्भी... तो था
और बस कह ही तो रहा था !

(निर्मल अगस्त्य)

2012 की डायरी से .......
   

Wednesday, January 14, 2015

"कोई ख़्वाब जो तुझे"

कोई ख़्वाब जो तुझे 
टोकता ही रहे,
कोई अक्स जो तुझे 
ढूँढता ही रहे। 

आसमाँ को क्यूँ होगा, इंतज़ार बादलों का
बादलों को क्यूँ होगा, इंतज़ार ज़मीं का
बेरुख़ी को क्यूँ होगा, इंतज़ार इल्तिज़ा का 
इल्तिज़ा का क्यूँ होगा, इंतज़ार तड़प का।  


ज़िन्दगी के आधे सच, आधे-आधे झूठे थे
ज़िन्दगी के आधे झूठ, आधे-आधे सच्चे थे, 
ज़िन्दगी ने आधी क़समें आधे मन से खायीं थीं 
ज़िन्दगी ने आधे मन को आधे तन  में पायी थी,
इन आधों में, इन वादों में, ज़िन्दगी कहाँ !


ज़िन्दगी के आधे ख़त, लिफ़ाफे में ही छूट गए 
ज़िंदगी के आधे रिश्ते, आधे पल में टूट गए,
ज़िन्दगी के आधे इरादे हाशियों में जागे थे
ज़िन्दगी के तीनो अक्षर, ढ़ाई छोड़ के भागे थे,
इन वादों में, इन इरादों में, ज़िन्दगी कहाँ !

कोई ख़्वाब जो तुझे 
टोकता ही रहे,
कोई अक्स जो तुझे 
ढूँढता ही रहे। 

आसमाँ को क्यूँ होगा, इंतज़ार बादलों का
बादलों को क्यूँ होगा, इंतज़ार ज़मीं का
बेरुख़ी को क्यूँ होगा, इंतज़ार इल्तिज़ा का 
इल्तिज़ा का क्यूँ होगा, इंतज़ार तड़प का।  

(मैंने इस गीत को एक हिन्दी फ़िल्म के लिए 2011 में लिखा और संगीतबद्ध किया था जिसकी रिकॉर्डिंग भी हो चुकी है लेकिन कई कारणों से फ़िल्म बन नहीं पाई।)
"निर्मल अगस्तय। "


 

Monday, January 12, 2015

"मन मिट्टी, तन बूँद ज़रा सी"

मन मिट्टी, तन बूँद ज़रा सी



मन है मिट्टी,
इसी में सब मिल जाना है!


माँ का अविश्वास
पिता का सन्ताप 
कि आकाश झूठा
पैसा सच्चा,


यह अविश्वास
और  यह सन्ताप 
चूँकि मेरे मन में भी आ बसा है
तो ज़िंदा है,
तैरता रहता है
उड़ता रहता है,
कभी  सिल बन कर जम जाता है
कभी पिघल कर बहने लगता है।


ईमानदारी झूठी,
दुनियावी ज़रूरतें सच्चीं
सच्चाई ख़राब
सफलता अच्छी,
सब समेटता है मन
और सब कुछ टटोल जाता है,
जब कहने के लिए
कहीं से शब्द नहीं मिलते।


और जो मिलते हैं
वो किसी ग़ुम हो गयी  डायरी के
उन पन्नों से भागे हुए हुए होते हैं,
जिन पन्नों को मोड़ कर
निशान लगाया जाता है अक़्सर
कि कुछ लिखना बाक़ी हो शायद।


जो बाक़ी है
वो भी मन है
और जो निबट गया
वो भी मन है।


जी गया !
और जीना है!
या शायद जी लेना है!
ये भी मन ही है।
मन न रहे
तो न अविश्वास रहे न माँ
न सन्ताप रहे न पिता,
न शरीर रहे न कलेवर
न मृत हो पायें न अजर !
पता नहीं मेरे शब्द क्यूँ ज़िंदा हैं 
शायद ये भी मन ही है।

"निर्मल अगस्त्य"
12 जनवरी, 2015
पटना