यह बस आज़ादी देने वाला जैसा ही था,
गरमा-गरम चाय की प्याली के साथ
घास पर लेट कर उपन्यास पढ़ने जैसा!
वह यूँ ही मुस्कुराता जब दोस्त पूछते- क्या हुआ?
वो उनसे कहता कि मैं हूँ अभी और बस ख़ुश हूँ!
बस्स...! उतना ही, जितनी चीनी की ज़रुरत है
बिना दूध वाली एक कप चाय के लिये
और आनन्द ले रहा हूँ छोटी-छोटी चीज़ों का,
जिन्हें शब्दकोषों में बहुत धीरे-धीरे सम्भाल कर
खरोंचों से बचा-बचा कर रखा जाता है।
मैं बस अच्छा हूँ, बस्स... अच्छा!
एक चम्मच चायपत्ती जितना,
न कम... न ज़्यादा!
और घास पर लेट कर
एक अच्छा सा उपन्यास पढ़ना चाहता हूँ, ठहर-ठहर कर!
शब्दों की तरह सुन्दर दिखना चाहता हूँ,
विरामों के साथ बढ़ते हुये और चाय पीते हुये।
और क्या?
आगे?
वह कहता है- मज़े में हूँ,
बस थोड़ा छुप-छुपा कर आया हूँ
और बस उतना ही जितनी हरियाली इन घासों में
और नीलापन आसमान में दिख रहा है।
आगे तो कुछ नहीं!
ज़रा जाने से पहले चाय पीना चाहता हूँ
और उपन्यास को अपने मन मुताबिक अन्तराल में पढ़ना चाहता हूँ,
अक्षरों की तरह टप्प... से बिखरना चाहता हूँ!
और वैसे भी यहाँ पहले से बढि़या है,
सामने उस पेड़ पर अभी-अभी एक चिड़ियां
मुँह में तिनका लेकर दसवीं या शायद बारहवीं बार लौटी है।
यहाँ कम से कम मेरे उपर गिर पड़ने के लिये
आसमान के अलावा कुछ ख़ास है भी नहीं।
चमकती धूप तो है लेकिन हमेशा की तरह
उसे आज भी किसी से मिलने जाना है
और बारिश जो होते-होते रह गयी है,
वहाँ... उस तालाब में अपना अक्स देखने में
नर्गिस की तरह घन्टों से खोई है।
ठीक है.... फिर कल?
वह चाय की प्याली उठाता है और कहता है
कि कल के बारे में कुछ तय नहीं
और आज तो मैं बस यहीं हूँ,
धीरे-धीरे मद्धिम होता हुआ,
शिथिल होता हुआ!
चाय पीने के लिये,
घास पर लेटने के लिये,
बेहद वाली ज़िन्दगी से छुप-छुपा कर
छोटी-छोटी हदों वाली ज़िन्दगी के बेहद पास,
भर साँस उजास में!
भागम-भाग से अवकाश में!
"निर्मल अगस्त्य"
02:32 AM
31-12-2015
पटना